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title: "स मे प्रियः"
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version: 1
last_updated: "2026-06-20"
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# स मे प्रियः

यह पाठ महर्षि व्यास द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय से लिया गया है, जिसमें भक्तियोग का वर्णन किया गया है। यह अध्याय ईश्वर की प्रियता और भक्तों के गुणों के बारे में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करता है।

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## Knowledge Snapshot

| Field | Details |
| :--- | :--- |
| Class | Class 11 |
| Subject | Sanskrit |
| Book | Bhaswati |
| Chapter | स मे प्रियः |
| Pages | 58-63 |

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## Chapter Summary

### Short Summary
प्रस्तुत पाठ में भक्तियोग का वर्णन तथा भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से भगवत्प्राप्ति का सरलतम मार्ग बताया गया है, जो वर्तमान युगीकरण में विशेष प्रासंगिकता रखता है।

### Detailed Summary
इस पाठ में भगवान श्रीकृष्ण भक्तों को बताते हैं कि ईश्वर को वही लोग प्रिय होते हैं जो अपने स्वार्थ को छोड़कर परमार्थ के लिए कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त, भक्तों को समभाव, संयम, और ज्ञान का अभ्यास करने का संतोष दिखाया गया है। इस पाठ में यह भी कहा गया है कि जिन्हें अहंकार का त्याग करके समस्त जीवों के हित के लिए कार्य करने की प्रेरणा मिलती है, वे ही सच्चे भक्त होते हैं।

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## Topic-Wise Explanation

### भक्तियोग का वर्णन
भक्तियों का मार्ग ईश्वर को प्रिय मानता है, जिसमें समर्पण और त्याग का महत्व है।

### ईश्वर की प्रियता
ईश्वर को वही भक्त प्रिय होते हैं जिनमें समर्पण और करुणा होती है।

### अहंकार और स्वार्थ का त्याग
स्वार्थ और अहंकार का त्याग कर जो लोग परमार्थ के कार्य में अग्रसर होते हैं, उन्हें ईश्वर का प्रेम प्राप्त होता है।

### कर्म का त्याग और ध्यान
ध्यान साधना द्वारा कर्म के फल का त्याग कर भक्त भगवान को प्राप्त करते हैं।

### गुणों का अवलोकन
भक्त में अद्वेष्टा, करुणा, और समभाव जैसे गुण होने चाहिए।

### समभाव का अभ्यास
समभाव का अभ्यास करते हुए भक्त को संतुलित मनोदशा बनाए रखनी चाहिए।

### प्रवृत्ति और त्याग
सच्चे भक्त अपनी प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर पर परिणाम का त्याग करते हैं।

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## Core Ideas

| Idea | Explanation |
| :--- | :--- |
| भक्तियोग | निस्वार्थ सेवा और समर्पण का मार्ग |

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## Key Concepts

| Concept | Meaning |
| :--- | :--- |
| भक्त | भगवान का सच्चा भक्त |
| प्रेम | निस्वार्थ भावना और समर्पण |

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## Important Points for Revision

* भक्तियोग का मुख्य उद्देश्य ईश्वर से जुड़ना है।
* अहंकार और स्वार्थ का त्याग आवश्यक है।
* सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखना चाहिए।
* समभाव और संतुलन की आवश्यकता है।
* ध्यान साधना से आत्मिक शांति मिलती है।
* चिंतन और अध्ययन का महत्व बढ़ना चाहिए।
* ईश्वर की कृपा पाने के लिए दीनता आवश्यक है।
* प्रवृत्तियों का नियंत्रण और त्याग करना चाहिए।

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## Vocabulary and Glossary

| Word / Phrase | Meaning |
| :--- | :--- |
| भक्तियोग | भगवान से जुड़ने का मार्ग |
| ज्ञान | सच्चे ज्ञान का महत्व |

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## Practice Questions

### Short Answer Questions

1. भक्तियोग का क्या महत्व है?
2. ईश्वर को प्रिय भक्त कौन होते हैं?
3. अहंकार का त्याग क्यों आवश्यक है?
4. समभाव का अभ्यास कैसे किया जाता है?
5. ध्यान साधना का क्या लाभ है?

### Long Answer Questions

1. पाठ में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भक्तों को कौन-कौन से गुणों की सीख दी गई है?
2. भक्तियोग में किस प्रकार की प्रवृत्तियों का त्याग किया जाना चाहिए?
3. पाठ से यह स्पष्ट करें कि ईश्वर को प्रिय भक्त का क्या अर्थ है।

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## Source Attribution

| Field | Value |
| :--- | :--- |
| Source | Edzy |
| Reference Type | examSubjectBookChapter |
| Reference ID | 6a17dddb703f0db7fcafeff5 |
| Canonical URL | https://www.edzy.ai/cbse-class-11-sanskrit-bhaswati-s-me-priy |
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