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last_updated: "2026-06-20"
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# कार्याकार्यव्यवस्थितिः

नवमः पाठः कार्याकार्यव्यवस्थितिः प्रस्तुत पद्य श्रीमद्भगवद्गीता के षोडश अध्याय से संकलित है। मोहग्रस्त अर्जुन को कहे गए ये वचन देशकालातीत हैं अर्थात् सार्वजनीन, सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक हैं।

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## Knowledge Snapshot

| Field | Details |
| :--- | :--- |
| Class | Class 12 |
| Subject | Sanskrit |
| Book | Bhaswati |
| Chapter | कार्याकार्यव्यवस्थितिः |
| Pages | 74-80 |

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## Chapter Summary

### Short Summary

इस पाठ में दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद् के भेद को स्पष्ट करते हुए स्वस्थ और संयमित जीवन जीने की शिक्षा दी गई है।

### Detailed Summary

इस पाठ में श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों के माध्यम से मनुष्य के लिए कार्य और अकर्म की विवेचना की गई है। यह समझाया गया है कि किस प्रकार दैवी सम्पद् द्वारा व्यक्ति को सद्गति और आत्मज्ञान प्राप्त होता है, जबकि आसुरी सम्पद् केवल विनाश और पतन की ओर ले जाती है।

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## Topic-Wise Explanation

### दैवी सम्पद्
यह सम्पद् उन गुणों का संग्रह है जो व्यक्ति को आत्मिक उन्नति में सहायक होती हैं। इसमें अहिंसा, सत्य, और दान जैसी तत्वों का समावेश है।

### आसुरी सम्पद्
यह सम्पद् उन दुष्कृतियों और अभावों को संदर्भित करती है जो व्यक्ति के पतन का कारण बनती हैं, जैसे क्रोध, अहंकार, और लोभ।

### कार्य और अकर्म
इस भाग में यह स्पष्ट किया गया है कि कार्य का अर्थ केवल शारीरिक कर्म नहीं है, बल्कि मन की शुद्धता और उद्देश्य की पवित्रता भी आवश्यक है।

### नरक के द्वार
इसमें उन तीन मुख्य भावनाओं का वर्णन है जो नरक के द्वार खोलती हैं: काम, क्रोध, और लोभ।

### साधना और व्यवहार
व्यक्ति को अपने साधना और व्यवहार के बीच सामंजस्य बैठाने का निर्देश दिया गया है।

### आत्मसंभ्रम
इसमें आत्म के सही ज्ञान और उसका परिचय कराना महत्त्वपूर्ण है।

### सत्कार्य की प्रेरणा
सही कार्यों की प्रेरणा और उनके पालन के लिए धार्मिक और नैतिक आधार आवश्यक है।

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## Core Ideas

| Idea | Explanation |
| :--- | :--- |
| दैवी सम्पद् | आत्मोत्थान के लिए आवश्यक सकारात्मक गुण। |
| आसुरी सम्पद् | व्यक्तित्व में विकृतियाँ जो पतन की ओर ले जाती हैं। |

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## Key Concepts

| Concept | Meaning |
| :--- | :--- |
| दान | अपने वस्त्र, भोजन, और वस्तुओं का भला हेतु दान करना। |
| अहिंसा | दूसरों को बिना किसी नुकसान पहुँचाए जीवन जीना। |

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## Important Points for Revision

* दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद् के बीच का भेद।
* अहिंसा, सत्य, और दान के गुणों का महत्व।
* कार्य और अकर्म का विवेचन।
* नरक के द्वार (काम, क्रोध, लोभ) को त्यागना।
* साधना का सही व्यावहारिक पहलू।
* आत्मज्ञान का महत्व।
* सद्गति की प्राप्ति के लिए उचित आचार।
* अर्जुन का मोह और उसके संदर्भ में दी गई उपदेश।

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## Vocabulary and Glossary

| Word / Phrase | Meaning |
| :--- | :--- |
| सम्पद् | गुणों का संग्रह। |
| अकर्म | निष्क्रियता या कार्य न करना। |

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## Practice Questions

### Short Answer Questions

1. दैवी सम्पद् के प्रमुख गुण क्या हैं?
2. आसुरी सम्पद् में कौन से भावनाएँ शामिल हैं?
3. नरक के द्वार में किन किन भावनाओं का समावेश है?
4. कार्य और अकर्म का अर्थ क्या है?
5. साधना का सही तरीका क्या होना चाहिए?

### Long Answer Questions

1. श्रीमद्भगवद्गीता में दैवी सम्पद् के गुण कैसे वर्णित किए गए हैं?
2. आसुरी सम्पद के परिणामों के बारे में चर्चा करें।
3. कार्य और अकर्म के वैकल्पिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करें।

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## Source Attribution

| Field | Value |
| :--- | :--- |
| Source | Edzy |
| Reference Type | examSubjectBookChapter |
| Reference ID | 6a17ed675d2b10c171c0080e |
| Canonical URL | https://www.edzy.ai/cbse-class-12-sanskrit-bhaswati-karyakaryvyvsthiti |
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