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अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ सभ्यता में

इस पाठ में प्रभाष जोशी ने मालवा की खाऊ-उजाड़ सभ्यता के संदर्भ में उसके जनजीवन, सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरणीय प्रभावितों का विश्लेषण किया है। लेखक ने बदलावों की तुलना की है और आधुनिक विकास के दुष्प्रभावों पर चिंता व्यक्त की है।

Summary, practice, and revision
CBSE
Class 12
Hindi
Antral Bhag - II

अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ सभ्यता में

Author: प्रभाष जोशी

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More about chapter "अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ सभ्यता में"

प्रभाष जोशी का 'अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ सभ्यता में' पाठ मालवा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समृद्धि के साथ-साथ वर्तमान समस्याओं की ओर इशारा करता है। पहले की fertile भूमि और जल संसाधनों के समृद्धतम दौर की तुलना करते हुए, लेखक ने वर्तमान खाऊ-उजाड़ सभ्यता के कारणों और इसके पर्यावरणीय परिणामों पर प्रकाश डाला है। नदियों और जलाशयों के सूखने के मुद्दे पर विश्लेषण किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक औद्योगिक विकास ने जनजीवन को कैसे नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। जोशी का लेख उद्देश्यपूर्ण है, जिसमें उन्होंने पर्यावरण के प्रति चिंता और आम जनता को इसके सरोकारों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया है।
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अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ सभ्यता में - Class 12 Hindi

प्रभाष जोशी का 'अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ सभ्यता में' पाठ मालवा की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय चिंताओं पर गहन चर्चा करता है। यह पाठ विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करता है।

पाठ में मालवा की विशेषताएँ उसकी समृद्ध मिट्टी, जलवायु और सांस्कृतिक विरासत के रूप में वर्णित की गई हैं। लेखक ने पहले के मालवा की स्थिति का उल्लेख किया है जो 'गहन गंभीर' और 'डग-डग रोटी, पग-पग नीर' वाला था। यह क्षेत्र कृषिगत उत्पादन के लिए प्रसिद्ध होना था, लेकिन现在 यह खाऊ-उजाड़ सभ्यता के दुष्प्रभावों के कारण बदल गया है।
खाऊ-उजाड़ सभ्यता उस जीवन शैली को संदर्भित करती है जो उपभोक्तावाद और संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर आधारित है। लेखक का तर्क है कि यह सभ्यता यूरोप और अमेरिका की देन है, जिससे न केवल मालवा, बल्कि पूरे विश्व का पर्यावरण बिगड़ रहा है।
मानसून के दौरान लगातार बारिश का सकारात्मक प्रभाव होता है, जिससे कृषि में वृद्धि होती है और सामुदायिक जीवन में उत्साह बढ़ता है। हालांकि, जब बारिश अधिक होती है, तो यह फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है जैसे कि पानी में डूब जाना। पाठ में बताया गया है कि बारिश मालवा के जीवन को कैसे प्रभावित करती है।
पाठ में उल्लेख किया गया है कि वर्तमान में बारिश का स्तर पहले की स्थितियों की तुलना में घट गया है। यह जलवायु परिवर्तन, आधुनिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण हो रहा है। इसीलिए, लोग अब कम बारिश को भी अधिक मानते हैं।
लेखक ने नदियों की बिगड़ती स्थिति के बारे में चिंता जताई है। उन्होंने उल्लेख किया है कि नदियाँ सूख रही हैं और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति खाऊ-उजाड़ सभ्यता के कारण हो रही है, जिससे ज्ञात जलाशयों का अस्तित्व खतरे में है।
पाठ में बताया गया है कि औद्योगिक विकास और खाऊ-उजाड़ सभ्यता के कारण पर्यावरणीय विनाश हो रहा है। यह पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो रहा है, जैसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन।
जोशी इस पाठ में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं, जैसे कि 'हमारी सभ्यता किस दिशा में जा रही है?', 'क्या हमारे विकास के तरीके सही हैं?' और 'क्या हम अपने पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार हैं?'। यह सवाल पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
पाठ में सांस्कृतिक विरासत का महत्व इस रूप में है कि यह स्थान की आत्मा और पहचान को दर्शाता है। लेखक ने इसे वर्तमान स्थिति से जोड़ा है, जहां आधुनिक परिवर्तन पारंपरिक मान्यताओं और जैसे जीवनशैली को प्रभावित कर रहे हैं।
पाठ में चर्चा की गई है कि मालवा 'मालव धरती गहन गंभीर' थी, जहां उत्पादन की भरपूर मात्रा अविलंबित थी। बदली हुई जलवायु के कारण अब यहाँ की स्थिति बहुत अधिक स्वस्थ नहीं रही है। उदाहरण के तौर पर, शिप्रा नदी का समय-समय पर सूखना।
पाठ में जोशी ने पर्यावरण की चिंता को गहराई से व्यक्त किया है। वह बताते हैं कि आधुनिक जीवनशैली ने प्राकृतिक संतुलन को नष्ट कर दिया है और लोगों को चेतावनी देते हैं कि हमें अपनी प्राथमिकताएँ और व्यवहार बदलने की आवश्यकता है।
लेखक के अनुसार, यूरोप और अमेरिका ने खाऊ-उजाड़ सभ्यता का विकास कर इसे वैश्विक स्तर पर फैलाया है। इसने अन्य देशों पर भी प्रभावित किया है, परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ी हैं।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पाठ का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं। लेखक ने बताया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय समस्याओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया है और इस क्षेत्र की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित किया है।
यह पाठ जनसत्ता में 1 अक्टूबर 2006 को प्रकाशित हुआ था।
यद्यपि पाठ में 'Agar Aisa Na Hota' का विशेष रूप से उल्लेख नहीं है, फिर भी पाठ का मुख्य धारा विचार मानता है कि यदि पूर्व समस्याओं के समाधान के लिए कदम उठाए गए होते, तो मौजूदा संकट से बचा जा सकता था।
पाठ का सामाजिक प्रभाव यह है कि यह लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करता है और उन्हें प्रोत्साहित करता है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को समझें और कार्य करें। जोशी के विचार स्पष्ट रूप से समाज में योगदान देने की प्रेरणा देने का कार्य करते हैं।
पाठ में भविष्य की दिशा का संकेत है कि यदि हम पर्यावरणीय विनाश को रोकने का प्रयास नहीं करते हैं, तो आने वाले समय में स्थितियाँ और खराब हो सकती हैं। लेखक हमें विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं कि हमें अपने कार्यों को बदलने और सुधारने की आवश्यकता है।
पाठ में लोगों को उनके पर्यावरण के लिए जिम्मेदारियों का अहसास कराने के लिए कई पहलुओं पर ध्यान दिया गया है। जोशी ने लोगों को बदलते जलवायु और उसके प्रभावों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया है।
यह पाठ समाज में पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति जागरूकता फैलाने और लोगों को उनकी जिम्मेदारियों का बोध कराने में महत्वपूर्ण है। यह एक महत्वपूर्ण संदेश प्रस्तुत करता है कि हमें अपने प्राथमिकताओं और जीवनशैली को बदलने की आवश्यकता है।
पाठ में तकनीकी जानकारी का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन पर्यावरणीय समस्याओं और उनके प्रभावों के बारे में गहन सोच और विश्लेषण किया गया है। जोशी का लक्ष्य सामान्य लोगों को इन समस्याओं से अवगत कराना रहा है।
पाठ में सांस्कृतिक प्रथाओं जैसे कि नवरात्रि पर घरों को सजावट, पारंपरिक समारोहों और त्योहारों का उल्लेख है जो स्थानीय जीवनशैली का हिस्सा हैं।
लेखक ने विकास की औद्योगिक सभ्यता को 'उजाड़ की अपसभ्यता' के रूप में चित्रित किया है, जो प्राकृतिक संसाधनों के अति शोषण और पर्यावरणीय समस्याओं का कारण बनी है।
नहीं, यह पाठ न केवल मालवा के संदर्भ में है, बल्कि लेखक की चिंताओं के माध्यम से एक वैश्विक संदर्भ में पर्यावरण और विकास के मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित करता है।
इस पाठ का मुख्य संदेश यह है कि संतुलित विकास के लिए आवश्यक है कि हम अपने पर्यावरण का ध्यान रखें और अपनी जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तनों को अपनाएं।

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अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ सभ्यता में Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

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