कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्
NCERT Class 12 Sanskrit Chapter 8: कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम् (Pages 75–82)
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Summary of कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्
कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम् at a Glance
CBSE
Class 12
Sanskrit
Shashwati
8
75–82
6 study resources
कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम् Summary
प्रस्तुत पाठ में शिवाजी के एक विश्वसनीय दूत की कहानी है, जो अपने कार्य को पूरा करने के लिए खतरे और कठिनाइयों का सामना करता है। यह पाठ प्रेरणा और साहस का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि कभी भी कठिनाइयों के सामने आने पर, यदि व्यक्ति का संकल्प दृढ़ हो, तो वह अपनी मंजिल तक पहुँच सकता है। दूत, जो एक तेज़ हयना है, सिंहदुर्ग से तोरणदुर्ग तक एक पत्र लेकर जाता है। रास्ते में उसे भयंकर प्रकृति के तूफानों तथा अवरोधों से गुजरना पड़ता है। बावजूद इसके, उसका साहस और मनोबल उसे लक्ष्य की ओर बढ़ने से नहीं रोकता। वह कहता है कि वह या तो अपने कार्य को सफल बनायेगा या फिर अपने प्राणों की बाजी लगाएगा। यह कथन, 'कार्यं वा साधयेयं, देहं वा पातयेयम्', इस भाव को व्यक्त करता है कि व्यक्ति को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कितना भी बड़ा बलिदान देना पड़े, वह नहीं रुकना चाहिए। पाठ में कई कठिन परिस्थितियों का वर्णन है, जैसे काले बादलों का आना, तीव्र आँधी और रुकावटें, लेकिन दूत अपनी दिशा नहीं बदलता। इस प्रकार का दृढ़ संकल्प हमें अपने लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं। यह कहानी हमें यह सीख देती है कि असली वीरता केवल बाहरी युद्ध में नहीं, बल्कि जीवन की समस्त चुनौतियों का सामना करने में भी होती है। पाठ का यह संदेश आज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें जीवन में चुनौतियों के सामने न झुकने, बल्कि उन्हें अपने संकल्प और साहस से पार करने की प्रेरणा देता है।
