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मैया मैं नहि माखन

मैया मैं नहीं माखन पाठ, सूरदास की रचना है। इसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और माँ यशोदा के प्रति उनकी भोली छवि का चित्रण किया गया है। इस कविता का अध्ययन विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य में रुचि बढ़ाने में मदद करेगा।

Summary, practice, and revision
CBSE
Class 6
Hindi
Malhar

मैया मैं नहि माखन

Author: सूरदास

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More about chapter "मैया मैं नहि माखन"

पाठ 'मैया मैं नहीं माखन' सूरदास द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें श्रीकृष्ण की माखन खाने की भोली सफाई का चित्रण है। इस कविता में श्रीकृष्ण की मासूमियत और उनकी माता यशोदा के प्रति प्रेम दर्शाया गया है। सूरदास, 15वीं शताब्दी के एक महान कवि हैं, जिनकी रचनाएँ श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का खूबसूरत वर्णन करती हैं। पाठ में काव्य के विभिन्न तत्वों जैसे शब्दार्थ, कविता संरचना, और भावार्थ पर चर्चा की गई है, जिससे विद्यार्थियों को कविता की गहराई और सांस्कृतिक महत्व को समझने में मदद मिलती है।
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मैया मैं नहीं माखन: सूरदास की अद्भुत रचना | कक्षा 6 हिंदी

जानिए 'मैया मैं नहीं माखन' कविता के भावार्थ, सूरदास के जीवन एवं शिक्षाएँ। यह कविता अद्भुत काव्य और भावनाओं का मिश्रण है, जो बच्चों को हिंदी साहित्य में रुचि बढ़ाने में मदद करेगी।

पाठ का शीर्षक 'मैया मैं नहीं माखन' है। यह सूरदास द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें श्रीकृष्ण की मासूमियत को दर्शाया गया है।
सूरदास 15वीं शताब्दी के प्रसिद्ध संत और कवि हैं। उन्होंने अपना जीवन श्रीकृष्ण के गुणगान में बिताया और उनकी रचनाएँ आज भी प्रचलित हैं।
श्रीकृष्ण ने अपनी माँ यशोदा से कहा कि वह माखन नहीं खा सकते क्योंकि उनके छोटे हाथ हैं, और उन्होंने माँ का ध्यान खींचने के लिए मासूमियत भरी बातें की।
इस कविता में मुख्य भावना माता-पिता के प्रति प्यार और बच्चों की मासूमियत को दर्शाया गया है, जिसमें श्रीकृष्ण अपनी माँ से सफाई देने का प्रयास करते हैं।
यह कविता श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन करती है और सूरदास की अद्भुत काव्य शैली के कारण बहुत प्रसिद्ध है। इसकी सरलता और मधुरता इसे बच्चों और बड़ों दोनों में लोकप्रिय बनाती है।
'भोर' का अर्थ सुबह होता है, जब गायों को चराने भेजा जाता है, और 'साँझ' का अर्थ शाम होता है, जब श्रीकृष्ण रात को घर लौटते हैं।
कविता में बच्चों की मासूमियत, मातृ-पितृ संबंधों का महत्व और बच्चों में सिखाने की आवश्यकताएँ प्रमुखता से दिखाई जाती हैं।
कविता में तुकबंदी का विशेष ध्यान रखा गया है, जिससे कविता का प्रवाह और संगीतमयता बनी रहती है, जैसे 'पठायो' और 'आयो' दोनों शब्दों का अंतिम ध्वनि समान है।
'लकुहट कमररया' एक ऐसे झोले को दर्शाता है जो खाने-पीने की चीज़ों को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग किया जाता है।
'गवाल-बाल' श्रीकृष्ण के साथी होते हैं जो गाइयों की देखभाल में उनकी मदद करते हैं, और यह शब्द उनका प्यार भरा संबोधन भी है।
सूरदास ने इस कविता के माध्यम से श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मनमोहक चित्रण किया है, जिससे बच्चों और बड़े दोनों को सिखने और आनंदित होने का अवसर मिलता है।
कविता का गहन अध्ययन शब्दार्थ, काव्य की विशेषताएँ, संदर्भ, और इसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर किया जा सकता है।
'मधुबन' वह स्थान है जहाँ श्रीकृष्ण गायों के साथ खेलते हैं, और यह उनका प्रिय स्थान माना जाता है।
'तुर्क' कविता के उन शब्दों का समूह है जिनका अंत समान ध्वनि में होता है, जिससे कविता में एक लय और संगीतात्मकता आती है।
पाठ के अंत में छात्रों को सामाजिक मूल्य, नैतिक शिक्षा और माता-पिता के प्रति आदर की भावना सिखाई गई है।
कविता में श्रीकृष्ण की मासूमियत, उनकी शरारतें और उनकी माता यशोदा के प्रति अथाह प्यार का वर्णन किया गया है।
हां, यह कविता बच्चों को हिंदी भाषा की संरचना, भावार्थ, और सामाजिक मूल्यों को समझने में मदद करती है।
माँ यशोदा ने श्रीकृष्ण को गले लगाया क्योंकि वे उनकी भोली बातों पर विश्वास कर ली थीं और उनके प्रति उनका प्यार प्रकट किया।
कविता के शब्दार्थ, कविता की विशेषताएँ, सामाजिक शिक्षा और काव्य की प्रविधियों पर चर्चा की जानी चाहिए।
'भोर' दिन की शुरुआत का प्रतीक है, 'गाय' भारतीय संस्कृति में पवित्रता का प्रतीक है, और 'माँ' स्नेह और प्यार का प्रतीक है।
पाठ का दूसरा शीर्षक 'श्रीकृष्ण की मासूमियत' या 'माता यशोदा और श्रीकृष्ण' हो सकता है।
यह कविता कक्षा 6 के छात्र-छात्राओं के लिए उपयुक्त है, जो हिंदी भाषा और साहित्य में रुचि रखते हैं।
हां, पाठ में श्रीकृष्ण और माँ यशोदा के बीच संवाद कविता की जीवंतता को दर्शाता है और दर्शकों को उनके भावनात्मक जुड़ाव का अनुभव कराता है।
कविता में समय के माप जैसे 'चार पहर' का उल्लेख, यह दिखाता है कि समय का महत्व कितना है और यह जीवन के सभी पहलुओं को किस तरह प्रभावित करता है।
कविता के अंत में सूरदास ने अपने नाम का उल्लेख किया है, जिससे पाठक को उनकी पहचान मिलती है और उनकी रचनाओं की वैधता बढ़ती है।

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