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ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)

कक्षा 9 हिंदी (गंगा) का अध्याय ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ लता मंगेशकर के साक्षात्कार पर आधारित है। इसमें उनकी पहचान, शुरुआती गायन, माता-पिता के संस्कार, जीवन के संघर्ष, संगीत की शक्ति और सहकर्मियों से जुड़े अनुभव सरल भाषा में सामने आते हैं।

Summary, practice, and revision

Author: यतींद्र मिश्र

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ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

More about chapter "ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)"

यह अध्याय ‘ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)’ एक आत्मीय प्रश्नोत्तर शैली में लता मंगेशकर के जीवन और संगीत-यात्रा की झलक देता है। साक्षात्कार में उनकी पहचान ‘आवाज़’ से जुड़ी बताई गई है और यह भी कि उन्होंने पाँच वर्ष की आयु में पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली। पिता के अनुशासन, मेहनत और रागदारी वाले गायन, साथ ही माँ के स्वाभिमानी संस्कारों का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव दिखता है—किसी के आगे हाथ न फैलाना, सही बात पर दृढ़ रहना और परिवार की जिम्मेदारी निभाना। लता जी शुरुआती समय की रिकॉर्डिंग-भागदौड़, तकनीकी सीमाओं और संगीतकारों के प्रयोगों का उल्लेख करती हैं तथा पुराने-नए संगीत की कल्पनात्मक तुलना भी करती हैं। वे अभिनय की दुनिया से अपनी असहजता, त्योहारों (होली, दीवाली, नवरात्र/‘गुड़ी पड़वा’) की घरेलू परंपराएँ, महाराष्ट्र का ‘मंगलागौर’ उत्सव, और कोरस गायिकाओं के साथ आत्मीय संबंध साझा करती हैं। अंत में संगीत की ‘असीम शक्ति’ और जीवन की अस्थायीता पर उनका दार्शनिक दृष्टिकोण उभरता है—‘गांव बह जाता है, नाव रह जाती है’।

Class 9 Hindi Ganga Chapter: ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) | Summary, FAQs

कक्षा 9 हिंदी (गंगा) अध्याय ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ का संक्षेप, विषय-वस्तु और 25 महत्वपूर्ण FAQs। लता मंगेशकर की पहचान, शुरुआती गायन, माता-पिता के संस्कार, संघर्ष, रिकॉर्डिंग अनुभव, कोरस, त्योहार और संगीत की शक्ति—सब सरल भाषा में।

यह अध्याय एक साक्षात्कार (इंटरव्यू) है, जिसमें प्रश्नोत्तर के माध्यम से लता मंगेशकर के जीवन, संगीत-यात्रा और व्यक्तित्व के पहलुओं को सामने रखा गया है। बातचीत का केंद्र उनकी पहचान (आवाज़), शुरुआती संगीत-शिक्षा, माता-पिता के संस्कार, जीवन के संघर्ष, तकनीकी बदलावों के बीच रिकॉर्डिंग का अनुभव, त्योहारों की परंपराएँ, सहकर्मियों से संबंध और संगीत की ‘असीम शक्ति’ जैसे विषय हैं। यह पाठ छात्र-छात्राओं को प्रेरणा, जीवन-मूल्य और कला के प्रति समर्पण समझाने के लिए रचा गया है।
पाठ की शुरुआत ही ‘मेरी आवाज़ ही पहचान है!’ कथन से होती है, जो यह स्पष्ट करता है कि लता मंगेशकर की असली पहचान उनकी आवाज़ है। उनके बारे में कहा गया है कि उन्होंने अपनी आवाज़ से भारत ही नहीं, दुनिया के कोने-कोने में पहचान बनाई। साक्षात्कार में भी उनकी चर्चा एक ऐसी कलाकार के रूप में है, जिनके बिना भारतीय संगीत की बात अधूरी लगती है। इस तरह ‘पहचान’ केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि कला-साधना और स्वर की विशिष्टता से बनी स्थायी छवि के रूप में प्रस्तुत होती है।
पाठ के अनुसार लता मंगेशकर ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली। आगे चलकर वे जीवनभर संगीत के प्रति समर्पित रहीं। साक्षात्कार में भी पिता के अभ्यास, नाट्य-परंपरा और शास्त्रीय संगीत से जुड़े वातावरण का वर्णन मिलता है—घर में संगीत सभा होना, रागदारी वाले गायन की परंपरा, और पिता का हमेशा काम व संगीत में डूबा रहना। यही शुरुआती संस्कार उनकी दीर्घ संगीत-यात्रा की मजबूत नींव बने।
लता जी बताती हैं कि बचपन में जब वे और भाई-बहन शरारत करते थे, तो पिता सबको बुलाकर सामने खड़ा करते और केवल गंभीरता से देखते थे। वे कुछ कहते नहीं थे, न डाँटते थे, फिर भी बच्चे समझ जाते थे कि गलती हुई है और रोना शुरू हो जाता था। पिता बस पूछते—‘समझ गए न?’ और बच्चों के ‘हाँ’ कहते ही बोलते—‘अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।’ यह प्रसंग दिखाता है कि अनुशासन डर से नहीं, समझ और संकेत से भी स्थापित हो सकता है।
पाठ में लता जी बताती हैं कि उनके पिता के गायन की एक बड़ी विशेषता यह थी कि वे एक राग गाते हुए ‘सुर बदलकर’ भी अपना गायन करते थे। वे किसी सुर को ‘सा’ (षडज) मानकर राग का रूप बदल देते, जिससे राग नया-सा हो जाता, और फिर उसी समय नए राग में गाते हुए वापस पहले राग में लौट आते। यह रागदारी और स्वर-प्रयोग की उच्च कला थी। इस वर्णन से शास्त्रीय संगीत में रचनात्मकता, नियंत्रण और अभ्यास का महत्व समझ में आता है।
लता जी के अनुसार उनके पिता की ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होकर देर रात दो-तीन बजे तक चलते थे। नाटकों में पाँच अंक होते और लंबी रागदारी वाले गायन की परंपरा भी रहती थी। वे बताती हैं कि उनके यहाँ बिना संगीत के कोई ड्रामा नहीं होता था। जिस दिन ड्रामा नहीं होता, उस दिन घर में संगीत की सभा होती—बहुत लोग आते, और उस दिन नाटक के गीत नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत होता। इस माहौल ने उनके भीतर संगीत के प्रति गंभीरता और समर्पण विकसित किया।
लता जी कहती हैं कि उन्होंने पिता से सबसे ज्यादा ‘स्वाभिमान से जीने’ की प्रेरणा पाई। उनके दिए संस्कारों से उन्हें सही बात पर खड़े रहने की ताकत मिली और यह सीख मिली कि यदि कोई बात सही लगे तो उसे करना चाहिए, किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं। वे यह भी बताती हैं कि उन्होंने कभी किसी से जरूरत के लिए पैसे या सामान माँगने की बात नहीं की—इसे वे पिता के संस्कार मानती हैं। यह शिक्षा उनके संघर्ष के समय और बाद की सफलता—दोनों में उपयोगी रही।
पाठ में लता जी बताती हैं कि पिता के निधन के बाद बुरे हालात में जीना भी उन्होंने देखा। ऐसे समय में उनकी माँ का संस्कार भी वही था—कैसे भी स्वाभिमान के साथ जीना है, लेकिन किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है। यह मूल्य परिवार के लिए सहारा बना। लता जी बताती हैं कि आज उनके पास नाम और पैसे हैं, घर छोटा सही पर वे खुश हैं, और इसके लिए वे ईश्वर को धन्यवाद देती हैं कि पिता-माँ के संस्कारों पर चलने का प्रयास सभी भाई-बहनों ने किया।
लता जी बताती हैं कि वे और उनके भाई-बहन फिल्में देखकर उनकी नकल करते थे। वे ‘प्रभात’ कंपनी की फिल्म ‘संत तुकाराम’ का उदाहरण देती हैं, जिसमें तुकाराम के वैकुंठ जाने का दृश्य है। बच्चे घर में गद्दे-तकिए रखकर ‘स्वर्ग’ बनाते, लता जी ऊपर बैठकर गीत गातीं और नीचे मीना, पंढरीनाथ तथा आशा अनुयायी बनकर रोते हुए साथ ले चलने की विनती करते। यह प्रसंग बचपन की कल्पनाशीलता, मनोरंजन और धार्मिक फिल्मों के प्रभाव को दिखाता है।
लता जी बताती हैं कि वे अक्सर धार्मिक फिल्मों की नकल करते थे क्योंकि उनके पिता धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे। यह उनका ‘सख्त अनुशासन’ था। इसलिए बच्चे चोरी-चोरी तब फिल्म-खेल खेलते थे जब पिता घर के बाहर होते और उन्हें पता न चले कि घर में फिल्मों की नकल चल रही है। इससे स्पष्ट होता है कि घर का अनुशासन उनके मनोरंजन के चयन तक में प्रभावी था, और बच्चों की दुनिया में फिर भी खेल-कल्पना अपना रास्ता बना लेती थी।
लता जी कहती हैं कि उन्होंने शुरुआत में फिल्मों में काम किया था और कुल छह-सात फिल्मों में अभिनय किया। लेकिन उन्हें मेकअप करना, लाइट के सामने जाना, बहुत लोगों के सामने रोना-हँसना या अभिनय करना अच्छा नहीं लगता था। अच्छी फिल्मों को देखकर सराहना जरूर होती है, पर अभिनय करने के बारे में वे सोच भी नहीं सकतीं। यह उनके स्वभाव की सादगी और मंच/स्टूडियो में ‘गायन’ को प्राथमिकता दिखाता है। अभिनय से दूरी का कारण उनकी असहजता है, न कि कला का अपमान।
लता जी बताती हैं कि एक फिल्म ‘छत्रपति शिवाजी’ हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी। इसमें भालजी पेंढारकर थे, जिन्हें वे ‘बाबा’ कहती थीं। उस समय तक उन्होंने अभिनय छोड़ दिया था, फिर भी वे उनके पास गईं और आग्रह किया कि फिल्म के आखिरी गाने में वे दो पंक्तियाँ गा लें। उन्होंने हिंदी और मराठी—दोनों संस्करणों में दो पंक्तियाँ गाईं और जिन दृश्यों में वे मौजूद भी हैं। लता जी कहती हैं कि उन्हें छत्रपति शिवाजी बहुत पसंद थे, इसलिए बस इसी फिल्म के लिए उनका मन हुआ।
लता जी कहती हैं कि उनकी परिस्थितियाँ बहुत अच्छी या बहुत बुरी—ऐसा निश्चित कहना मुश्किल है, क्योंकि वे इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थीं। पर वे बहुत मेहनत करती थीं। उन्हें याद है कि रिकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी और एक स्टूडियो से दूसरे-तीसरे स्टूडियो के चक्कर में पूरा दिन निकल जाता था। उन्हें अपने गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा दूसरी चीजों की सुध नहीं रहती थी। उनके मन में मुख्य बात यही रहती कि किसी तरह परिवार को संभालना और उनकी जरूरतें पूरी करना है।
साक्षात्कार में लता जी बताती हैं कि उनके लिए रिकॉर्डिंग की कठिनाइयों से ज्यादा चिंता यह रहती थी कि आने वाले समय में कितने गीत रिकॉर्ड होने हैं और नई फिल्मों के गाने कब रिकॉर्ड करने हैं। उनका ध्यान लगातार काम पर था ताकि वे अधिक से अधिक कमा सकें और परिवार की जरूरतें पूरी कर सकें। रिकॉर्डिंग का समय हो या घर का खाली समय—उनका पूरा समय इसी सोच में निकल जाता था। यह उनके उत्तरदायित्व, मेहनत और लक्ष्य-केन्द्रित जीवन को दिखाता है, जो संघर्ष के दिनों में उन्हें आगे बढ़ाता रहा।
लता जी कहती हैं कि कोई खास सपना तो नहीं था, लेकिन बचपन की एक बात बताती हैं। उनके पिता जब कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे तो जो मेडल मिले होते, उन्हें कपड़ों पर सीने के बाईं ओर लगाते थे। उस समय कलाकार प्रदर्शन में मेडल पहनकर बैठते थे। लता जी को यह बहुत पसंद आता था, खासकर जब उन्होंने पं. कुमार गंधर्व को काली शेरवानी में ढेर सारे मेडल लगाकर गाते देखा। तब उन्हें लगता था कि जब वे बड़ी होंगी तो उन्हें भी ऐसे मेडल मिलेंगे जिन्हें लगाकर वे किसी कार्यक्रम में जाएँगी।
पाठ में 1949-50 के शुरुआती दौर का संदर्भ देकर दिखाया गया है कि लता जी के फिल्मी संगीत जीवन की मजबूत नींव कैसे बनी। प्रश्न में खेमचंद प्रकाश, शंकर-जयकिशन, हुस्नलाल-भगतराम जैसे संगीत निर्देशक और ‘आएगा आने वाला’ (महल), ‘हवा में उड़ता जाए’ (बरसात), ‘चले जाना नहीं’ (बड़ी बहन) जैसे गीतों का उल्लेख है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये गीत एक नए युग की शुरुआत और लता जी के कद को बड़ा करने में सहायक बताए गए हैं। इससे छात्रों को काल-परिवेश भी समझ आता है।
लता जी बताती हैं कि पुराने समय में तकनीकी रूप से सिनेमा में बहुत तरक्की नहीं थी। ‘आएगा आने वाला’ की रिकॉर्डिंग में उन्हें हॉल में बहुत दूर से चलकर दबे पाँव रिकॉर्डिंग वाले माइक तक आना पड़ता था, और उसी अनुपात में माइक पर स्वर का उतार-चढ़ाव तय किया जाता था। वे यह भी बताती हैं कि कुछ विशेष प्रभाव देने के लिए अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी, सी. रामचंद्र जैसे संगीतकार नए तरीके और अजीबोगरीब टोटके आजमाते थे। इससे तकनीक और रचनात्मक प्रयोग—दोनों का महत्व स्पष्ट होता है।
लता जी यह मानती हैं कि समय के साथ तकनीक बहुत विकसित हो गई है, और अगर पुराने संगीतकारों को आज की तकनीक मिलती तो वे और भी अधिक ‘एडवांस’ संगीत रच सकते थे। साथ ही वे यह भी सोचती हैं कि आज के सुंदर और स्तरीय संगीतकार (जैसे प्रश्न में रहमान, जतिन-ललित आदि) यदि पीछे जाकर पुराने समय में काम करते, तो तकनीकी सीमाओं के कारण उन्हें कठिनाइयों और संघर्ष का सामना करना पड़ता। वे इसे एक रोचक कल्पना मानती हैं और स्पष्ट निष्कर्ष देने के बजाय दोनों युगों की स्थितियों को समझने का दृष्टिकोण देती हैं।
लता जी बताती हैं कि पहले वे होली खेलती थीं, खासकर जब उनके पिता जीवित थे, लेकिन अब उन्होंने होली खेलना बंद कर दिया है। वे यह भी स्पष्ट करती हैं कि उनके यहाँ होली ‘देशभर में प्रचलित’ तरीके जैसी नहीं मनती थी। होली के एक दिन पहले होलिका दहन के समय पूजा होती, प्रसाद की मिठाइयाँ और नारियल होलिका में डाले जाते, फिर नारियल निकालकर तोड़कर प्रसाद लिया जाता। जो राख बनती, उसे अगले दिन एक-दूसरे पर डालते—इसे वे ‘गुड़वड़’ कहती हैं। होली के पाँचवें दिन रंग-पंचमी पर माँ-पिता केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते और आरती उतारते।
लता जी बताती हैं कि उनके घर में होली की तुलना में दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्व था। नवरात्र भी उनके यहाँ धूमधाम से मनता था, लेकिन महाराष्ट्र में इसका रूप कुछ अलग बताया गया है। वे ‘गुड़ी पड़वा’ का वर्णन करती हैं, जो नवरात्र के पहले दिन मनाया जाता है—घर के बाहर ‘गुड़ी’ बाँधना, कलश स्थापना, सूर्योदय के समय बताशों की माला चढ़ाना और सूर्यास्त तक उतार लेना तथा प्रसाद लेना। इस आयोजन को वे बहुत महत्वपूर्ण कहती हैं और इसे भगवान राम के अयोध्या लौटने की मान्यता से जोड़ती हैं।
लता जी बताती हैं कि पचास के दशक में, जब वे फिल्म इंडस्ट्री में नई थीं और काम चलने लगा था, तब कुछ वर्षों तक उन्होंने दीवाली के दिन अपने सीनियर संगीत निर्देशकों के घर मिठाई लेकर जाने की परंपरा शुरू की। वे दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे नहा-धोकर कई संगीतकारों के घर पहुँच जाती थीं। नौशाद साहब के यहाँ सुबह साढ़े पाँच बजे पहुँचने पर वे घबरा गए और पूछ बैठे कि इतनी सुबह कोई मुसीबत तो नहीं। लता जी ने दीवाली की बधाई और मिठाई देने की बात कही। यह प्रसंग उनके सम्मान, विनम्रता, संबंधों की गरिमा और संगीत जगत में आत्मीय व्यवहार को दिखाता है।
लता जी बताती हैं कि उनके यहाँ होली-दिवाली पर घरों में गीत गाने की परंपरा उस तरह नहीं है, लेकिन विवाह के बाद जब नई बहू घर आती है, तब एक पूजा होती है जिसमें पास-पड़ोस की बहुत सारी महिलाएँ आती हैं। इसे ‘मंगलागौर’ कहा जाता है। महिलाएँ बहुत ‘मुग्ध भाव’ से गीत गाती हैं और नाचती भी हैं, बिल्कुल ठेठ गाँव के अंदाज में। लता जी को याद है कि बचपन में शादी के बाद मंगलागौर खूब मनाया जाता था और सभी लोग नाचते-गाते थे; कुछ स्त्रियाँ नौटंकी और तमाशा की तरह भी रूप धरकर नाचती थीं। वे यह भी कहती हैं कि यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
लता जी बताती हैं कि उस समय कोरस गाने वाली लड़कियों का एक ग्रुप था जो अलग-अलग संगीतकारों (जैसे नौशाद, मदन मोहन, शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल आदि) के यहाँ जाता था। लगातार साथ काम करने से मेल-मुलाकात गहरी पहचान और आत्मीयता में बदल गई। वे कहती हैं कि कोरस की लड़कियाँ उनके लिए घर जैसी थीं; सबका घर में आना-जाना था। रिकॉर्डिंग के समय स्टूडियो में कुर्सियाँ कम होतीं तो वे जमीन पर बैठतीं और लता जी भी उनके साथ जमीन पर बैठकर बातें करती थीं। यह व्यवहार औपचारिक नहीं, बल्कि अपनापन दर्शाता है।
लता जी के अनुसार 1960 के आसपास जो कोरस ग्रुप उन्हें मिला था, वह लगभग 1980 तक वैसे ही चलता रहा, फिर उसमें बदलाव हुआ और कुछ लोगों ने गाना बंद कर दिया या छोड़ दिया। वे यह भी बताती हैं कि 1980 के बाद ऐसा होने लगा कि कोरस वालों का म्यूजिक पहले रिकॉर्ड हो जाता था और बाद में मुख्य गायक-गायिकाएँ जाकर अपने हिस्से गा आती थीं। उससे पहले के दौर में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस अक्सर मुख्य गानों के साथ ही रिकॉर्ड होते थे—चाहे डुएट हो या सोलो। यह जानकारी रिकॉर्डिंग परंपरा में तकनीकी-संगठनात्मक परिवर्तन को समझाती है।
लता जी कहती हैं कि हरिदास बाबा और तानसेन जैसी कथाओं को सम्मानपूर्वक माना जा सकता है, क्योंकि संभव है उनकी कला में ‘सच्चा सुर’ या आत्मा की आवाज़ लगी हो, लेकिन वे यह निश्चित रूप से नहीं कह सकतीं कि घटनाएँ सचमुच हुई ही हों, क्योंकि उनका ऐसा अनुभव नहीं है। फिर भी वे मानती हैं कि संगीत में असीम शक्ति है और वह कुछ ‘अप्रत्याशित’ जरूर रच देता है, जिसका अनुभव कई बार हुआ है। वे अपने पिता को सुनते हुए भी ऐसे अप्रत्याशित अनुभव की बात करती हैं। इस तरह उनका निष्कर्ष संतुलित है—श्रद्धा के साथ, पर अंध-निश्चय के बिना।
लता जी बताती हैं कि वे मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ और पं. रविशंकर का कॉन्सर्ट सुन रही थीं। अली अकबर खाँ अत्यंत मंत्रमुग्ध करने वाला वादन कर रहे थे कि लगभग पचास-साठ मिनट बाद ‘ठन’ से सरोद की एक तार टूट गई और उन्हें बजाना बंद करना पड़ा। बाद में मिलने पर लता जी ने अफसोस जताया, तो उन्होंने कहा—“बहन, जब बहुत सुर में तार लगती है, तो टूट जाती है।” लता जी को इससे लगता है कि संगीत की सीमा अनंत है और शुद्ध स्वर का प्रभाव इतना गहरा हो सकता है कि वाद्य भी उसे सह न पाए। यह प्रसंग संगीत की साधना, तीव्रता और प्रभाव की समझ बढ़ाता है।
लता जी मराठी कहावत ‘गांव गेला वाहून, नाव गेला राहून’ का अर्थ बताती हैं—गांव तो बह जाता है, लेकिन नाव रह जाती है। वे इसे जीवन के संदर्भ में समझाती हैं कि शरीर या भौतिक चीजें स्थायी नहीं हैं, पर ‘नाम’ या कर्म का प्रभाव रह सकता है। वे स्पष्ट करती हैं कि उनका गाना अजर है, पर शरीर अजर नहीं; उसे जाना ही है। इस विचार से पाठ में दार्शनिकता और विनम्रता आती है—प्रसिद्धि पर गर्व नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता और अच्छे कर्म/कला की स्थायित्व-भावना।
साक्षात्कार के अंत तक लता जी की छवि सादगी, समर्पण, कृतज्ञता, स्वाभिमान और जिम्मेदारी निभाने वाली कलाकार की बनती है। वे अपने प्रशंसकों के प्रेम के प्रति आभार व्यक्त करती हैं और यह भी कहती हैं कि उन्हें जितना प्रेम मिला, उतना आभार वे गाकर भी शायद नहीं जता पाईं। वे ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हैं, शरीर की नश्वरता स्वीकार करती हैं और अपने पिता का नाम आगे बढ़ाने को अपनी खुशी मानती हैं। साथ ही वे यह प्रार्थना करती हैं कि ईश्वर की कृपा हर कलाकार और नेक इंसानों पर भी रहे। यह दृष्टि उन्हें ‘अमर’ कहे जाने पर भी विनम्र बनाती है।