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भारति, जय, विजयकरे!

‘भारति, जय, विजयकरे!’ (निराला) एक प्रेरणादायक देशभक्ति कविता है, जिसमें भारतभूमि को देवी-रूप में चित्रित किया गया है। इसमें कृषि-संपन्नता, प्राकृतिक सौंदर्य (हिमालय, गंगा, वन-लता) और आध्यात्मिक चेतना (ओंकार) के माध्यम से भारत की विजय-श्री की कामना व्यक्त होती है।

Summary, practice, and revision

Author: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

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भारति, जय, विजयकरे! Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

More about chapter "भारति, जय, विजयकरे!"

कक्षा 9 की हिंदी पुस्तक ‘गंगा’ का अध्याय ‘भारति, जय, विजयकरे!’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ओजपूर्ण देशभक्ति कविता पर केंद्रित है। कविता की शुरुआत में कवि ‘भारति’ को संबोधित कर भारत की विजय-श्री की कामना करता है और भारतभूमि को ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ कहकर उसकी कृषि-परंपरा, समृद्धि और सौंदर्य को उभारता है। भारत का चित्रण देवी की तरह किया गया है—समुद्र उसके चरणों को धोता है, तरु-तृण-वन-लता उसका वसन हैं और गंगा की धवल धारा उसके गले का हार। हिमालय को ‘मुकुट’ के रूपक से भारत की गरिमा दिखाई गई है। ‘प्राण प्रणव ओंकार’ और ‘ध्वनित दिशाएँ’ जैसे पद भारत को एक चेतन सत्ता बताते हैं, जहाँ आध्यात्मिक गूँज और विविध स्वर-परंपराएँ समाहित हैं। अध्याय में संस्कृतनिष्ठ, समासयुक्त भाषा, मानवीकरण, रूपक तथा अनुप्रास जैसे काव्य-सौंदर्य पर भी ध्यान दिलाया गया है।

Class 9 Hindi Chapter: भारति, जय, विजयकरे! (गंगा) — सार, व्याख्या, अलंकार व महत्वपूर्ण प्रश्न

कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ का अध्याय ‘भारति, जय, विजयकरे!’ (निराला): कविता का सार, प्रमुख भाव, ‘कनक-शस्य-कमलधरे’, गंगा-हिमालय के रूपक, अनुप्रास/रूपक अलंकार, समासयुक्त शब्द और परीक्षा हेतु 25 FAQs।

यह कविता देशप्रेम और राष्ट्रगौरव का प्रेरणादायक उद्घोष है। आरंभ में ही कवि ‘भारति, जय, विजयकरे!’ कहकर भारत की विजय-श्री की कामना करता है। आगे वह भारत को ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ कहकर कृषि-संपन्नता और श्रम-सौंदर्य का संकेत देता है। कविता में हिमालय, गंगा, वन-लता, सागर जैसे प्राकृतिक प्रतीकों से भारतभूमि की महिमा रची गई है। ‘प्राण प्रणव ओंकार’ जैसी पंक्तियाँ भारत की आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक गूँज को भी सामने लाती हैं।
कविता में ‘भारति’ का संबोधन भारतभूमि/भारत्माता के लिए आया है। दिए गए शब्द-संपदा के अनुसार ‘भारति/भारती’ का अर्थ सरस्वती, वाणी, वाणी की अधिष्ठात्री और भारत्माता भी होता है। इसी बहुअर्थकता के कारण कवि का संबोधन केवल भूगोल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक पहचान भी समेट लेता है। कविता में भारत को देवी-रूप में देखा गया है, इसलिए ‘भारति’ भारत्माता के रूप में केंद्रीय प्रतीक बन जाती है, जिसके चरणों को सागर धोता है।
‘कनक-शस्य-कमलधरे!’ का भावार्थ भारत की धान्य-समृद्धि और कृषि-वैभव से है। संदर्भ में स्पष्ट है कि कवि इस संबोधन से भारत की ‘कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य’ को दर्शाता है। ‘कनक-शस्य’ का अर्थ सोने जैसी फसलें/उपज और ‘कमलधरे’ का अर्थ कमल को धारण करने वाली—यह समासयुक्त, संस्कृतनिष्ठ अभिव्यक्ति भारतभूमि को समृद्ध, उर्वर और सौंदर्यपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है। इसलिए यह पंक्ति भारत की सम्पन्नता और जीवनदायिनी धरती का गुणगान करती है।
कविता में भारत की भौगोलिक और प्राकृतिक सुंदरता का ऐसा चित्र खींचा गया है मानो भारत कोई देवी हो। पाठ-प्रसंग के अनुसार समुद्र अपने जल से उसके चरण धोता है और नदी-वन-पुष्प, हिमालय, गंगा जैसी प्राकृतिक शोभा को उसके ‘वस्त्राभूषण’ की तरह प्रस्तुत किया गया है। कविता की पंक्तियों में ‘सागर-जल धोता शुचि चरण युगल’ तथा ‘गंगा… धवल धार हार गले’ जैसी छवियाँ भारत को सजीव, पूज्य और दिव्य रूप देती हैं। यह मानवीकरण और रूपक का प्रभावी प्रयोग है।
इस पंक्ति में गंगा को प्रकाश-युक्त, पवित्र और उज्ज्वल धारा के रूप में दिखाया गया है। ‘ज्योतिजल’ का अर्थ प्रकाश/रोशनी से जुड़ा है और ‘धवल’ का अर्थ सफेद, स्वच्छ, निर्मल। कवि कल्पना करता है कि गंगा की धवल धार भारत के गले में हार की तरह पड़ी है—अर्थात गंगा भारत का गौरव-आभूषण है। यह चित्रण भारत की पवित्रता, सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक वैभव को साथ-साथ उभारता है, जैसा कि संदर्भ में ‘वस्त्राभूषण’ के रूप में प्रकृति-शोभा प्रस्तुत करने की बात कही गई है।
कविता में हिमालय को ‘मुकुट’ के रूप में रूपक अलंकार द्वारा प्रस्तुत किया गया है। संदर्भ में स्पष्ट किया गया है कि वास्तव में हिमालय मुकुट नहीं है, लेकिन कवि कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे देता है, जिससे भारत की छवि भव्य और दिव्य बनती है। ‘शुभ्र हिम-तुषार’ हिमालय की श्वेत बर्फ/तुषार को संकेत करता है, जो मुकुट की चमक जैसी लगती है। इस प्रकार हिमालय भारत की गरिमा, ऊँचाई और गौरव का प्रतीक बन जाता है।
‘प्राण प्रणव ओंकार’ पंक्ति भारत की आध्यात्मिक चेतना को सामने लाती है। शब्द-संपदा के अनुसार ‘प्राण’ जीवन-शक्ति/साँस है और ‘प्रणव’ ओंकार। ‘ओंकार’ को ‘आरंभ’ और ‘ॐ’ के उच्चारण/स्मरण से जोड़ा गया है। संदर्भ में बताया गया है कि कवि भारत को ‘चेतन सत्ता’ के रूप में देखता है, जिसकी दिशाओं में ‘ओंकार’ की गूँज है। इसलिए यह पंक्ति भारत के जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा, सांस्कृतिक अनुगूँज और एकत्व-बोध का संकेत देती है।
यह अभिव्यक्ति भारत की व्यापक, उदार और गूँजती हुई चेतना को रेखांकित करती है। ‘ध्वनित’ का अर्थ गूँजना/प्रतिध्वनि होना और ‘उदार’ का अर्थ दानशील, दयालु, व्यापक दृष्टि वाला है। संदर्भ में कहा गया है कि कवि भारत को ऐसी चेतन सत्ता मानता है जिसकी दिशाओं में ‘ओंकार’ की गूँज है और जो अनेक प्रकार के स्वरों व विचारों से समृद्ध है। इसलिए ‘ध्वनित दिशाएँ उदार’ का भाव यह है कि भारत की संस्कृति और आत्मा हर दिशा में व्यापकता और उदारता का संदेश देती है।
इस पंक्ति में ‘शतमुख’ (सौ मुख) और ‘शतरव’ (सौ की संख्या में ध्वनि/गूँजार) जैसे शब्दों से बहुलता और गूँज का प्रभाव पैदा किया गया है। ‘मुखरे’ का अर्थ बजता/शब्द करता हुआ है। संदर्भ में भारत को अनेक प्रकार के स्वरों और विचारों से समृद्ध बताया गया है; यह पंक्ति उसी विविधता और सक्रिय सांस्कृतिक ध्वनि को व्यक्त करती है। साथ ही पाठ में बताया गया है कि ‘शतमुख’ और ‘शतरव’ में ‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार भी बनता है, जो ओज बढ़ाता है।
यह पंक्ति भारत को देवी के रूप में स्थापित करती है। ‘सागर-जल’ द्वारा ‘शुचि चरण युगल’ (पवित्र चरणों का जोड़ा) धोने की कल्पना से भारत की पवित्रता, पूजनीयता और महानता व्यक्त होती है। संदर्भ में भी कहा गया है कि भारत की भौगोलिक सुंदरता का चित्र ऐसा है मानो भारत कोई देवी हो, जिसके चरणों को समुद्र अपने जल से धोता है। इस रूपकात्मक और मानवीकृत दृश्य से कवि भारत की गरिमा को वैश्विक विस्तार (समुद्र/दिशाएँ) के साथ जोड़ता है।
इस पंक्ति में कवि कल्पना करता है कि पेड़ (तरु), घास (तृण), वन और लताएँ भारत का ‘वसन’ यानी वस्त्र हैं। अर्थ यह कि भारत की प्राकृतिक संपदा उसकी शोभा और पहचान का अभिन्न अंग है। संदर्भ में स्पष्ट कहा गया है कि नदी, वन, पुष्प, हिमालय, गंगा आदि प्राकृतिक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण की तरह प्रस्तुत किया गया है। इसलिए ‘तरु-तृण-वन-लता’ केवल दृश्य नहीं, बल्कि भारत की जीवनदायिनी प्रकृति और उसके सौंदर्य-वैभव का काव्यात्मक वस्त्र-रूपक है।
अध्याय के अभ्यास प्रश्न (बहुविकल्पी) के अनुसार इस कविता में विशेष रूप से भारत के ज्ञान, प्रकृति और सम्पन्नता की प्रशंसा की गई है। कविता में ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ से कृषि-समृद्धि, हिमालय-गंगा-वन-लता से प्राकृतिक वैभव, और ‘प्राण प्रणव ओंकार’ से आध्यात्मिक/सांस्कृतिक चेतना का बोध होता है। इस तरह यह रचना भारत को केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि ज्ञान-परंपरा, प्रकृति-सौंदर्य और समृद्ध संस्कृति का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करती है।
अभ्यास प्रश्नों के अनुसार कविता की भाषा और शैली ‘संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त’ है। पाठ में ‘कनक-शस्य-कमलधरे’, ‘ज्योतिजल-कण’, ‘सागर-जल’, ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ जैसे समस्त/सामासिक पदों पर ध्यान दिलाया गया है। ऐसी भाषा कविता को ओज, गंभीरता और भाव-गरिमा प्रदान करती है। साथ ही अलंकार (अनुप्रास, रूपक) के प्रयोग से शैली चित्रात्मक बनती है और भारतभूमि का मनोमय चित्र उभरता है, जैसा कि ‘कविता का सौंदर्य’ खंड में बताया गया है।
अध्याय के ‘कविता का सौंदर्य’ भाग में कुछ प्रमुख विशेषताएँ बताई गई हैं—प्रकृति का मानवीकरण, अलंकारों का प्रयोग, समस्त/सामासिक पदों का प्रयोग और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली। भारत को देवी मानकर समुद्र से चरण धुलवाना मानवीकरण है। ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’ में हिमालय को मुकुट कहना रूपक अलंकार है। ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ में ‘श’ की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार बनता है। इन विशेषताओं से कविता ओजपूर्ण और चित्रात्मक बन जाती है।
अध्याय में स्पष्ट उदाहरण दिया गया है—‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’। यहाँ ‘शतमुख’ और ‘शतरव’ में ‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति हो रही है, इसलिए इसे अनुप्रास अलंकार कहा गया है। यह पुनरावृत्ति ध्वनि-सौंदर्य बढ़ाती है और पंक्ति में गूँज, उत्साह और ओज का प्रभाव पैदा करती है। इसी कारण कविता का राष्ट्रगानात्मक स्वर अधिक प्रभावी बनता है। पाठ के अनुसार जहाँ-जहाँ ऐसा ध्वनि-साम्य हो, वहाँ अनुप्रास माना जाता है और छात्रों से ऐसी पंक्तियाँ खोजने को कहा गया है।
रूपक अलंकार का प्रमुख उदाहरण ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’ है। अध्याय में बताया गया है कि हिमालय वास्तव में मुकुट नहीं है, लेकिन कवि कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे देता है। जब उपमेय (हिमालय) में उपमान (मुकुट) का अभेद स्थापित किया जाता है, तब रूपक अलंकार बनता है। इस रूपक से भारत की छवि राजसी, भव्य और दिव्य हो जाती है, क्योंकि मुकुट सम्मान और श्रेष्ठता का प्रतीक है।
‘स्तव’ का अर्थ प्रशंसा/स्तुति है। ‘स्तव कर बहु-अर्थ-भरे’ का संकेत यह है कि भारत की प्रशंसा अनेक अर्थों और पक्षों से की जा सकती है। अध्याय के ‘मातृभाषा और भाव’ खंड में इसी पंक्ति के आधार पर बताया गया है कि भारत की प्रशंसा विविध अर्थों में की गई है, और छात्रों को अपनी मातृभाषा में भारत-स्तुति की कविता रचने का अभ्यास दिया गया है। कविता में प्रकृति, समृद्धि, पवित्रता और चेतना—सब मिलकर ‘बहु-अर्थ’ भरते हैं।
कविता में प्रकृति के कई प्रतीक भारत के वैभव को उभारते हैं—सागर, वन, पुष्प, हिमालय और गंगा। पंक्तियों में समुद्र द्वारा चरण धोने का दृश्य, ‘तरु-तृण-वन-लता’ को वस्त्र, और ‘गंगा… धवल धार’ को हार बताना प्रकृति को भारत के आभूषण के रूप में दिखाता है। ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’ से हिमालय की श्वेत भव्यता सामने आती है। संदर्भ में भी कहा गया है कि इन प्राकृतिक शोभाओं को भारत के ‘वस्त्राभूषण’ की तरह प्रस्तुत किया गया है।
संदर्भ के अनुसार कवि भारत को ‘एक चेतन सत्ता’ के रूप में देखता है। यह भाव ‘प्राण प्रणव ओंकार’ और ‘ध्वनित दिशाएँ उदार’ जैसी पंक्तियों से प्रकट होता है, जहाँ दिशाओं में ओंकार की गूँज और अनेक स्वरों-विचारों से समृद्धि का संकेत है। यानी भारत केवल भूमि नहीं, बल्कि जीवंत आत्मा है, जिसमें आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक ध्वनियाँ निरंतर सक्रिय हैं। इस चेतनता के कारण कविता का स्वर उत्साह, विश्वास और विजय-प्रार्थना से भर जाता है।
अध्याय के ‘समास—समस्त पद एवं विग्रह’ खंड में बताया गया है कि ‘कनक-शस्य’ और ‘कमलधरे’ समस्त/सामासिक पद हैं। समास का अर्थ संक्षेप है—दो या अधिक शब्दों के मेल से नया शब्द बनता है। यहाँ ‘कनक-शस्य’ का अर्थ ‘कनक के समान शस्य’ (सोने जैसी फसलें) बताया गया है और ‘कमलधरे’ का अर्थ ‘हे कमल को धारण करने वाली’। इसलिए ये पद संक्षिप्त, संस्कृतनिष्ठ और अर्थ-समृद्ध बन जाते हैं, जो कविता की शैली की प्रमुख विशेषता है।
ये शब्द शुद्धता, उज्ज्वलता और पवित्रता का भाव गहराते हैं। शब्द-संपदा के अनुसार ‘शुचि’ का अर्थ पवित्र/शुद्ध/निर्मल, ‘धवल’ का अर्थ सफेद/स्वच्छ/निर्मल, और ‘शुभ्र’ का अर्थ उज्ज्वल/चमकीला/श्वेत है। जब कवि ‘शुचि चरण युगल’, ‘धवल धार’ और ‘शुभ्र हिम-तुषार’ कहता है, तो भारत की छवि पवित्र, दिव्य और तेजस्वी बनती है। साथ ही ये शब्द देवी-रूपक को भी मजबूत करते हैं।
शब्द-संपदा के अनुसार ‘ज्योतिजल/ज्योतिस’ का अर्थ प्रकाश, रोशनी, लौ, सूर्य, नक्षत्र, अग्नि आदि से जुड़ा है। कविता में ‘गंगा ज्योतिजल-कण’ कहकर गंगा को केवल जलधारा नहीं, बल्कि प्रकाश-सी पवित्र और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह गंगा की सांस्कृतिक महत्ता और भारत की आध्यात्मिक चमक को जोड़ता है। ‘धवल धार’ के साथ मिलकर यह छवि गंगा को भारत के ‘हार’ की तरह उज्ज्वल आभूषण बनाती है।
क्योंकि यह कविता संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त भाषा का उदाहरण है, जिसे समझने के लिए छात्रों को समस्त पदों की पहचान और विग्रह आना जरूरी है। अध्याय में ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ जैसे पदों को समास शब्द बताकर समास का अर्थ ‘संक्षेप’ समझाया गया है। साथ ही कविता से कुछ सामासिक पद—जैसे ‘शतदल’, ‘ज्योतिजल’, ‘शतमुख’, ‘सागरजल’—चुनकर उनके समास-विग्रह लिखने को कहा गया है। इससे शब्दार्थ स्पष्ट होते हैं और कविता का भाव अधिक सही तरीके से समझ आता है।
शीर्षक एक उद्घोष/प्रार्थना की तरह है। ‘भारति’ भारत्माता/भारत की चेतना का संबोधन है, ‘जय’ विजय का जयघोष, और ‘विजयकरे’ का अर्थ विजय करे/विजयी हो। संदर्भ में कहा गया है कि कविता के आरंभ में ही कवि ‘भारति, जय, विजयकरे!’ कहकर भारत को विजय-श्री प्राप्त करने की कामना करता है। इसलिए शीर्षक पूरे पाठ का सार है—देश के गौरव, उत्थान और सफलता की आकांक्षा, जिसे कविता के प्राकृतिक और आध्यात्मिक चित्र और अधिक प्रभावी बनाते हैं।
भारत की कृषि-परंपरा ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ संबोधन से रेखांकित होती है। संदर्भ में बताया गया है कि कवि इस पंक्ति से भारत की कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य को दर्शाता है। ‘शस्य’ का अर्थ फसल/उपज है और ‘कनक’ के समान कहकर फसलों की समृद्धि और चमक का संकेत मिलता है। इस प्रकार कविता भारत की सम्पन्नता को खेती, अन्न और धरती की उर्वर शक्ति से जोड़कर देखती है, जो राष्ट्रगौरव का एक आधार बनता है।
कविता में भौगोलिक सुंदरता का चित्र देवी-कल्पना के माध्यम से रचा गया है। समुद्र का भारत के चरण धोना, गंगा की धवल धारा का हार बनना, हिमालय का मुकुट होना, और वन-लता-तृण का वस्त्र बनना—ये सभी भारत के भौगोलिक विस्तार और प्राकृतिक विविधता को एक जीवंत रूप देते हैं। संदर्भ में कहा गया है कि भारत की भौगोलिक सुंदरता का ऐसा चित्र खींचा गया है मानो भारत कोई देवी हो। इसलिए भूगोल केवल स्थान नहीं रहता, वह श्रद्धा और सौंदर्य का अनुभव बन जाता है।
अध्याय के अनुसार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ और वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उनकी औपचारिक शिक्षा नौवीं तक हुई, लेकिन उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया। प्रमुख काव्य रचनाएँ—‘अनामिका’, ‘परिमल’, ‘गीतिका’, ‘कुकुरमुत्ता’ और ‘नए पत्ते’—बताई गई हैं। वे उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध लेखन में भी प्रसिद्ध रहे; निधन 1961 में हुआ।
अध्याय में निराला की रचनाओं की विशेषताओं के रूप में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता तथा प्रकृति का विराट और उदात्त चित्रण बताया गया है। यह भी कहा गया है कि छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उपेक्षितों और पीड़ितों के प्रति उनकी कविताओं में गहरी सहानुभूति मिलती है। ‘भारति, जय, विजयकरे!’ में भी प्रकृति का विराट चित्र, ओज और उदात्तता स्पष्ट दिखती है, जहाँ भारत की विजय-श्री की कामना देशभक्ति के स्वर में व्यक्त होती है।