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दो बैलोों की कथा

कक्षा 9 हिंदी अध्याय ‘दो बैलों की कथा’ में हीरा और मोती के भाईचारे, पशुओं की भावना और स्वाभिमान को प्रेमचंद ने मार्मिक ढंग से दिखाया है। यह कहानी बताती है कि स्वतंत्रता और अपनापन सहज नहीं, संघर्ष और सहानुभूति से मिलते हैं।

Summary, practice, and revision

Author: प्रेमचंद

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दो बैलोों की कथा Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

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‘दो बैलों की कथा’ (पुस्तक: गंगा, विषय: हिंदी) में झूरी के दो बैल—हीरा और मोती—अपने गहरे संबंध, ‘मूक-भाषा’ और आपसी सहयोग के कारण यादगार बनते हैं। झूरी के साले गया के घर भेजे जाने पर वे अपमान, मार और सूखे भूसे का सामना करते हैं, इसलिए काम करने से इनकार करते हैं और बार-बार स्वतंत्रता पाने के लिए कोशिश करते हैं। भैरो की छोटी बेटी का स्नेह (रोज़ रोटियाँ देना और रस्सी खोलना) पशुओं की संवेदना और मनोदशा को उभारता है। रास्ते में वे संकटों से जूझते हैं, साँड़ से मिलकर लड़ते हैं और अंततः काँजीहाउस जैसी क्रूर व्यवस्था में बंद होकर भी विद्रोह व साहस दिखाते हैं; दीवार तोड़कर कई पशुओं को मुक्त कराने का प्रसंग संघर्ष के उद्देश्य को स्पष्ट करता है। कहानी का संदेश है कि स्वतंत्रता, स्वाभिमान और अपनापन की रक्षा हेतु संघर्ष आवश्यक है और पशु भी भावनात्मक रिश्तों को गहराई से जीते हैं। यह कथा परोक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से भी जुड़ती है।

Class 9 Hindi Chapter: दो बैलों की कथा (गंगा) - उद्देश्य, हीरा-मोती संबंध, स्वतंत्रता का प्रतीक

कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ का अध्याय ‘दो बैलों की कथा’—कहानी का उद्देश्य, प्रेमचंद का योगदान, हीरा- मोती का भाईचारा, पशुओं की भावना, पात्रों की मनोदशा और स्वतंत्रता/संघर्ष का संदेश। परीक्षा हेतु 25 महत्वपूर्ण FAQs सहित।

इस कहानी का उद्देश्य किसानों के जीवन और पशुओं के साथ उनके भावनात्मक संबंधों को मार्मिक ढंग से दिखाना है। साथ ही यह विचार भी सामने आता है कि स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती; उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। हीरा और मोती का बार-बार बंधन तोड़ना, अपमान सहकर भी स्वाभिमान बचाना, और कठिन परिस्थितियों में भी साथ निभाना इसी उद्देश्य को पुष्ट करता है। कथा यह भी दिखाती है कि पशुओं में भी संवेदना, मित्रता, कर्तव्य-बोध और अन्याय के प्रति प्रतिरोध की भावना होती है।
प्रेमचंद ने इस कथा में पशु-पक्षियों को भी आत्मीयता देकर उन्हें केवल ‘काम के साधन’ नहीं, बल्कि संवेदनशील पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने ग्रामीण परिवेश, किसान जीवन और पशुओं की पीड़ा को सरल, जीवंत और मुहावरेदार भाषा में प्रभावी बनाया। कहानी में ‘मूक-भाषा’ के जरिए हीरा-मोती की सोच और मनोदशा उभरती है, जिससे पाठक उनके संघर्ष को समझ पाते हैं। साथ ही लेखक ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष आवश्यक है, इसलिए कथा परोक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जुड़ती है।
हीरा और मोती का संबंध मुख्य रूप से एकता और सहयोग को दिखाता है। वे साथ उठते-बैठते, साथ खाते, और थकान मिटाने के लिए एक-दूसरे को चाटकर स्नेह जताते हैं। हल या गाड़ी में जोते जाने पर भी दोनों की कोशिश रहती है कि अधिक बोझ स्वयं उठाएँ, यानी साथी को कम कष्ट हो। संकट में भी वे अलग नहीं होते—मेोती पकड़ा जाता है तो हीरा लौटकर स्वयं भी पकड़ में आ जाता है। यह भाईचारा कहानी की भावनात्मक रीढ़ है और पूरे कथानक को आगे बढ़ाता है।
नए स्थान पर पहुँचकर दोनों बैलों ने नाँद में मुँह तक नहीं डाला क्योंकि उन्हें लगा कि मालिक ने उन्हें ‘बेच’ दिया है और उनका अपनापन छिन गया है। नए घर, नया गाँव और नए लोग उन्हें बेगाने लगते हैं, जिससे उनका मन भारी हो जाता है। आगे जाकर वहाँ उन्हें सूखा भूसा, मार और अपमान मिलता है, जबकि झूरी उन्हें कभी कठोरता से नहीं छूता था। इसलिए उनका इनकार केवल भोजन का नहीं, बल्कि स्वाभिमान और अपनापन खोने का प्रतिरोध भी है।
रस्‍सी तोड़कर घर लौटने के पीछे प्रमुख कारण स्वतंत्रता और अपनापन पाने की तीव्र इच्छा थी। नया स्थान उन्हें पराया लगा, और उन्हें लगा कि उनसे अन्याय हुआ है। रात में गाँव के सो जाने पर उन्होंने मजबूत पगहे तोड़ दिए और अपने पुराने घर की ओर चल पड़े। यह घटना बताती है कि बंधन चाहे कितने भी मजबूत हों, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की चाह उन्हें तोड़ सकती है। घर लौटकर झूरी का प्रेम, बच्चों का स्वागत और ‘पशु-वीर’ जैसी भावना उनके निर्णय की सार्थकता दिखाती है।
झूरी अपने बैलों से स्नेहपूर्ण व्यवहार करता था; वह उन्हें फूल की छड़ी से भी नहीं छूता था और केवल जिटकार पर वे चल पड़ते थे। जब बैल भागकर लौटे, तो झूरी उन्हें देखकर गद्गद हो गया और गले लगा लिया—यह दृश्य प्रेमालिंगन और चुंबन तक जाता है, जो मालिक-पशु के आत्मीय संबंध को दिखाता है। झूरी का व्यवहार कहानी में ‘अपनापन’ का प्रतीक है, जिसके लिए हीरा-मोती बार-बार संघर्ष करते हैं। अंत में झूरी के घर लौटना उनकी जीत और मानवीय करुणा की स्थापना है।
झूरी की पत्नी ने बैलों को लौटते देखकर उन्हें ‘नमक-हराम’ कहा और मान लिया कि वे कामचोर हैं जो एक दिन भी वहाँ काम नहीं कर पाए। उसने क्रोध में मेजूर को आदेश दिया कि बैलों को केवल सूखा भूसा दिया जाए, खली-चोकर नहीं। यह दृष्टिकोण उपयोगितावादी और कठोर है, जहाँ पशु को भावना और सम्मान वाले जीव की तरह नहीं देखा जाता। कहानी में झूरी की करुणा और पत्नी की कठोरता का विरोधाभास दिखता है, जिससे पशुओं की मनोदशा और ‘अपमान’ की पीड़ा अधिक स्पष्ट होती है।
गया के घर पहुँचकर हीरा और मोती अपमानित, भूखे और विद्रोह से भरे दिखाई देते हैं। उन्हें मोटी रस्सियों से बाँधा जाता है, मार पड़ती है और खाने में वही सूखा भूसा मिलता है, जबकि गया अपने बैलों को खली-चूनी देता है। ऐसे व्यवहार से उनके ‘आहत सम्मान’ की व्यथा बढ़ती है। वे हल में जोते जाने पर भी पाँव न उठाने की कसम-सी खा लेते हैं। भीतर-ही-भीतर स्वतंत्रता की चाह और अन्याय के प्रति क्रोध उनकी आँखों और व्यवहार में उतर आता है, जो आगे के संघर्षों का कारण बनता है।
गया द्वारा हीरा की नाक पर डंडे जमाने पर मोती का क्रोध नियंत्रण से बाहर हो जाता है और वह हल लेकर भागता है, जिससे हल, रस्सी और जुआ टूट-फूट जाते हैं। यह प्रतिक्रिया स्वाभिमान और अन्याय के प्रतिरोध जैसी मानवीय मनोवृत्ति का संकेत देती है। मोती केवल शारीरिक पीड़ा पर नहीं, बल्कि साथी के अपमान और अत्याचार पर भी प्रतिक्रिया करता है। हालांकि हीरा उसे रोकता है और ‘जाति-धर्म’ की बात करता है, फिर भी मोती का रोष बताता है कि अत्याचार सहते-सहते एक सीमा के बाद विद्रोह स्वाभाविक हो जाता है।
कहानी में ‘मूक-भाषा’ का प्रयोग इसलिए किया गया है ताकि हीरा और मोती की चेतना, भावनाएँ और विचार मनुष्यों की तरह स्पष्ट हो सकें। इससे उनकी आपसी सलाह, डर, क्रोध, नैतिकता और संघर्ष पाठक के सामने संवाद की तरह उभरते हैं। जैसे हीरा का कहना कि “भागना व्यर्थ है” या “हमारी जाति का यह धर्म नहीं”—ये वाक्य उनके चरित्र और मूल्यों को दिखाते हैं। ‘मूक-भाषा’ कहानी को रोचक बनाने के साथ-साथ यह भी स्थापित करती है कि पशु भी संबंध, सम्मान और स्वतंत्रता को समझते हैं।
भैरो की छोटी लड़की कहानी में करुणा और मानवता का उजला पक्ष है। उसकी माँ मर चुकी है और सौतेली माँ उसे मारती रहती है, इसलिए उसे बैलों से एक प्रकार की आत्मीयता हो जाती है। वह रात में उन्हें दो रोटियाँ देती है, जिससे उनकी भूख कम भले न हो, पर मन को भोजन मिलता है। बाद में वही लड़की उनकी रस्सी खोलकर भागने की सलाह देती है और नाक में नाथ डालने की योजना भी बताती है। उसका स्नेह दिखाता है कि प्रेम ‘प्रसाद’ बनकर पशुओं को संघर्ष में भी जीवित और साहसी बनाए रखता है।
हीरा और मोती बार-बार बंधनों को तोड़कर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हैं, इसलिए वे ‘स्वतंत्रता के प्रतीक’ बनते हैं। गया के घर की रस्सियाँ तोड़कर भागना, अत्याचार के विरुद्ध काम करने से इनकार करना, और काँजीहाउस की दीवार तोड़कर कई पशुओं को मुक्त कराना—ये सभी घटनाएँ दासता के खिलाफ प्रतिरोध दर्शाती हैं। कहानी में स्पष्ट कहा गया है कि स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती; उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। इसी वजह से यह कथा परोक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जुड़ती है और बैल जन-संघर्ष के प्रतीक लगते हैं।
काँजीहाउस का प्रसंग पशुओं के साथ होने वाले अन्याय और क्रूर व्यवस्था को तीखे रूप में दिखाता है। वहाँ कई पशु भूखे पड़े हैं, किसी के सामने चारा नहीं, केवल कभी-कभी पानी दिखता है। हीरा-मोती को जीवन में पहली बार पूरा दिन बिना तिनके के बिताना पड़ता है; वे दीवार की नमकीन मिट्टी चाटते हैं, फिर भी तृप्ति नहीं होती। इसी पीड़ा से विद्रोह की ज्वाला उठती है और वे दीवार तोड़ने का प्रयास करते हैं। यह प्रसंग बताता है कि अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष केवल अपने लिए नहीं, दूसरों की जान बचाने के लिए भी हो सकता है।
दीवार तोड़ना सिर्फ भागने की कोशिश नहीं, बल्कि सामूहिक मुक्ति का कार्य बन जाता है। हीरा अपने नुकीले सींगों से कच्ची दीवार गिराता है और बाद में मोती भी पूरा जोर लगाकर दीवार को और तोड़ देता है। दीवार गिरते ही घोड़े, बकरियाँ और भैंसें निकल जाती हैं—यानी कई जानें बचती हैं। मोती यह भी कहता है कि कम से कम नौ-दस प्राणियों की जान बच गई और वे आशीर्वाद देंगे। यह प्रसंग संघर्ष के नैतिक पक्ष को उजागर करता है: अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं, दूसरों के जीवन की रक्षा भी है।
कहानी में गधे दीवार गिरने के बाद भी डर और संकोच के कारण वहीं खड़े रहते हैं और कहते हैं कि कहीं फिर पकड़ लिए गए तो क्या होगा। यह स्थिति बताती है कि भय अवसर मिलने पर भी व्यक्ति या जीव को जकड़ सकता है। हीरा उन्हें समझाता है कि अभी भागने का अवसर है, फिर भी वे निर्णय नहीं ले पाते। यह तुलना कहानी के व्यापक संदेश से जुड़ती है—स्वतंत्रता पाने के लिए साहस और जोखिम उठाना पड़ता है, केवल सहनशीलता पर्याप्त नहीं। गधों का डर हीरा-मोती के संघर्ष और साहस को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
कहानी के अनुसार हीरा अधिक सहनशील, संयमी और नैतिकता पर टिकने वाला बैल है। वह कई बार मोती को रोकता है—जैसे गया पर हमला न करने की सलाह देना, भागने को ‘कायरता’ कहना, या ‘औरत जात’ पर सींग चलाना मना बताना। इसके विपरीत मोती अधिक गुस्सैल, त्वरित प्रतिक्रिया करने वाला और प्रतिरोधी स्वभाव का है; वह अत्याचार के जवाब में पलटने को तैयार रहता है। फिर भी दोनों की ये भिन्नताएँ एक-दूसरे को पूरा करती हैं: हीरा दिशा और विवेक देता है, मोती ऊर्जा और साहस—इसी से उनका संबंध मजबूत बनता है।
साँड़ से संघर्ष का प्रसंग दिखाता है कि संकट में एकता और रणनीति से बड़ी शक्ति को भी हराया जा सकता है। हीरा और मोती समझते हैं कि अकेले लड़ना कठिन है, इसलिए वे योजना बनाते हैं—एक आगे से रगेदेगा, दूसरा पीछे से; साँड़ जब एक पर झपटे तो दूसरा बगल से चोट करेगा। यह संगठित प्रयास सफल होता है और साँड़ घायल होकर भागता है, अंत में गिर भी पड़ता है। यह घटना उनके साहस, समझदारी और सहयोग को उजागर करती है। साथ ही यह संकेत देती है कि संघर्ष में केवल बल नहीं, सामूहिक रणनीति भी निर्णायक होती है।
हीरा बार-बार ‘धर्म’ और मर्यादा की बात इसलिए करता है क्योंकि उसके लिए संघर्ष का मतलब अंधा हिंसक बदला नहीं, बल्कि नियम और नैतिकता के भीतर प्रतिरोध है। वह मोती को समझाता है कि लाठी लेकर आने वालों पर तुरंत हमला करना ‘हमारी जाति का धर्म’ नहीं, और ‘औरत जात’ पर सींग चलाना मना है। बाद में वह यह भी कहता है कि गिरे हुए बैरी पर सींग नहीं चलाना चाहिए। इन कथनों से कहानी में भारतीय मूल्यों जैसे संयम, मर्यादा, और शक्ति के साथ नैतिक नियंत्रण का संकेत मिलता है, जो हीरा के चरित्र को गंभीर और प्रेरक बनाता है।
यह भाव मोती के भीतर के स्वाभिमान और दासता के प्रति अस्वीकार को दिखाता है। कहानी में जब दजढ़यल आदमी उन्हें नीलाम करके ले जा रहा होता है, तब मोती का लक्ष्य घर लौटकर किसी भी तरह अपने मालिक झूरी के पास पहुँचना है। अंत में जब वह दजढ़यल को सींग मारकर भगा देता है, तो उसके शब्दों जैसा ही व्यवहार दिखता है—वह जान की कीमत पर भी अन्यायी के ‘काम’ नहीं आना चाहता। यह कथन स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़े गए विचारों की तरह है: प्राण देना स्वीकार्य है, पर अन्याय के आगे झुकना नहीं।
कहानी में पशुओं की भावना कई स्तरों पर दिखती है—प्रेम, अपनापन, दुःख, विद्रोह और कृतज्ञता। हीरा-मोती एक-दूसरे को चाटकर प्रेम जताते हैं, साथ बैठते-उठते हैं और थकान मिटाते हैं। नए घर में पहुँचकर नाँद में मुँह न डालना उनके मन के भारीपन और अपनापन छूटने की पीड़ा दिखाता है। छोटी लड़की की रोटी उन्हें ‘भोजन’ नहीं, दिल का सहारा लगती है। काँजीहाउस में भूख और अपमान से विद्रोह पैदा होता है। अंत में झूरी से मिलने पर उनकी आँखों से आनंद के आँसू बहना पशुओं की गहरी संवेदना को स्पष्ट करता है।
गाँव के इतिहास में यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि दो बैल दूर से अकेले भागकर अपने पुराने घर लौट आए, जबकि उन्हें मजबूत रस्सियों और नए मालिक के दबाव में रखा गया था। उनके गले में आधा-आधा गराँव लटक रहा था और पैर कीचड़ से भरे थे, फिर भी वे सीधे झूरी के पास आ खड़े हुए। गाँव के बच्चे ढोल-ताली बजाकर स्वागत करते हैं और ‘बाल-सभा’ उन्हें ‘पशु-वीर’ मानकर अभिनंदन पत्र देने की बात करती है। यह प्रसंग दिखाता है कि पशु भी घर, संबंध और स्वतंत्रता की पहचान रखते हैं और जोखिम उठाकर लौट सकते हैं।
दिए गए संदर्भ में ‘जुलाई’ शब्द सीधे घटनाओं के रूप में नहीं आता, लेकिन कहानी का समय-परिवेश ग्रामीण कृषि जीवन से जुड़ा है—हल, गाड़ी, चारा, खेत, कीचड़ और मेहनत। लौटने पर बैलों के पैर “घुटने तक कीचड़ से भरे” दिखते हैं, जो बरसात/गीले मौसम जैसी स्थिति का संकेत देता है और यात्रा की कठिनाई बढ़ाता है। इसके अलावा खेतों में हरी फसल और चरने का प्रसंग भी ग्रामीण मौसम-चक्र की ओर इशारा करता है। ऐसे विवरण कहानी को यथार्थ बनाते हैं और पाठक को समझाते हैं कि मौसम/परिवेश पशुओं की थकान, भूख और संघर्ष को कैसे प्रभावित करता है।
नीलामी के समय एक दजढ़यल आदमी आता है जिसकी आँखें लाल हैं और मुद्रा कठोर है। वह बैलों के कूल्हों में उँगली गोदकर उनकी जाँच करता है, जिससे हीरा-मोती को अंतर्ज्ञान से डर लगता है और वे समझ जाते हैं कि वह उन्हें किस उद्देश्य से ले जा रहा है। वे आशंका करते हैं कि वह ‘छुरी चलाएगा’ और उनकी जान खतरे में है। नीलामी के बाद वह उन्हें डंडे से हाँकता है और धीमी चाल पर जोर से मारता है। यह पात्र कहानी में शोषण और क्रूरता का प्रतीक बनता है, जिसके विरुद्ध अंत में मोती का प्रतिरोध दिखाई देता है।
मुख्य मुद्दा बैलों के स्वामित्व (मालिकाना हक) का था। दजढ़यल आदमी कहता है कि उसने उन्हें मेवेशीखाने से नीलाम में लिया है, इसलिए वे उसके हैं। झूरी जोर देकर कहता है कि “मेरे बैल हैं” और प्रमाण के रूप में बताता है कि वे उसके द्वार पर खड़े हैं। वह दजढ़यल को चोर की तरह समझकर चले जाने को कहता है और चुनौती देता है कि वह थाने में रिपोर्ट कर दे। इस विवाद में कहानी ‘न्याय-अन्याय’ का संकेत भी देती है—काँजीहाउस में बंद होना और फिर नीलामी जैसे प्रसंग पशुओं के अधिकारों पर प्रश्न उठाते हैं।
संघर्ष का संदेश कई घटनाओं से सिद्ध होता है: (1) गया के घर अत्याचार के विरुद्ध हल में पाँव न उठाना, (2) रस्सी चबाकर तोड़ने और भागने की योजना, (3) साँड़ जैसे बड़े खतरे से मिलकर लड़ना, (4) काँजीहाउस की दीवार तोड़कर पशुओं को मुक्त करना, और (5) अंत में दजढ़यल आदमी के विरुद्ध मोती का साहसी प्रतिरोध। इन प्रसंगों में स्पष्ट है कि स्वतंत्रता या सम्मान एक बार में नहीं मिलता; बार-बार साहस, रणनीति और धैर्य से संघर्ष करना पड़ता है। कहानी यही सिखाती है कि अत्याचार सहना नहीं, उसका प्रतिरोध करना जीवन और स्वाभिमान की रक्षा का मार्ग है।
कहानी के अंत में जब बैल सुरक्षित लौट आते हैं और झूरी उन्हें सहलाते हुए खली-भूसा, चोकर और दाना भर देता है, उसी समय मालकिन भी आती है और दोनों के माथे चूम लेती है। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरू में वही मालकिन उन्हें ‘नमक-हराम’ कहकर सूखा भूसा देने की बात करती थी। अंत में उसका स्नेह दिखाता है कि बैलों की निष्ठा, संघर्ष और झूरी का अपनापन मालकिन के दृष्टिकोण को भी बदल देता है। यह संकेत देता है कि संवेदना जाग सकती है और संबंधों की सच्चाई कठोरता पर विजय पा सकती है।