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क्या लिखूँ?

‘क्या लिखूँ?’ में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी निबंध-लेखन की वास्तविक प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयों को सरल, आत्मपरक शैली में समझाते हैं। सामग्री-संग्रह, शैली, रूपरेखा, तथा ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’ जैसे विषयों के माध्यम से लेखन-कौशल विकसित कराया गया है।

Summary, practice, and revision

Author: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

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क्या लिखूँ? Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

More about chapter "क्या लिखूँ?"

हिंदी पाठ ‘क्या लिखूँ?’ में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी निबंध-रचना की प्रक्रिया को संवादात्मक, आत्मपरक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। लेखक बताता है कि कुछ लेखकों (ए.जी. गार्डिनर) के अनुसार लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है जिसमें विषय गौण और भाव प्रधान हो जाते हैं—‘हैट’ असली है, ‘खूँटी’ केवल माध्यम। पर लेखक स्वयं को ऐसा सहज प्रेरित लेखक नहीं मानता; उसे सोचना, चिंता करना और परिश्रम करके लिखना पड़ता है। परीक्षा में दिए गए दो विषय—‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’—पर आदर्श निबंध लिखते हुए वह निबंध-शास्त्रियों की सलाह (निबंध छोटा हो, सामग्री व शैली पर ध्यान हो, पहले रूपरेखा बने, भाषा में प्रवाह हो) और व्यवहारिक कठिनाइयों (समय की कमी, संदर्भ-सामग्री का अभाव) पर चर्चा करता है। आगे वह मोंतेन की अनुभव-आधारित, स्वच्छंद निबंध-पद्धति का उल्लेख करता है और अमीर खुसरो की कथा से प्रेरित होकर एक ही लेख में दोनों विषयों का समावेश करता है। पाठ निबंध-लेखन के लिए विषय-चयन, सामग्री, शैली, रूपरेखा, उदाहरणों और भावों की भूमिका को स्पष्ट करता है।

Class 9 Hindi (Ganga) Chapter: क्या लिखूँ? — निबंध लेखन प्रक्रिया, सामग्री-शैली, रूपरेखा व समाज-सुधार

Class 9 Hindi ‘Ganga’ के अध्याय ‘क्या लिखूँ?’ में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी निबंध-लेखन की रचना-प्रक्रिया, सामग्री व शैली, रूपरेखा का महत्व, ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’ विषयों की कठिनाइयाँ व उदाहरणों के माध्यम से समझाते हैं।

इस पाठ का मुख्य उद्देश्य निबंध-लेखन की रचना-प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से समझाना है। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी दो विषयों—‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’—पर आदर्श निबंध लिखने की मजबूरी के माध्यम से बताते हैं कि लिखना केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि सोच-विचार, सामग्री-संग्रह, रूपरेखा और शैली-निर्धारण जैसी चरणबद्ध तैयारी भी है। पाठ में निबंध-शास्त्रियों की सलाह और वास्तविक कठिनाइयों का टकराव दिखता है, जिससे विद्यार्थी लेखन-कौशल विकसित कर सकें।
लेखक के अनुसार सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि वह ए.जी. गार्डिनर जैसी “विशेष मानसिक स्थिति” का अनुभव नहीं करता, जिसमें भाव अपने आप उठते हैं और विषय की चिंता नहीं रहती। उसे लिखने के लिए सोचना, चिंता करना और परिश्रम करना पड़ता है। ऊपर से परीक्षा के लिए दो अलग विषयों पर सीमित समय में निबंध तैयार करने की बाध्यता है, जबकि उसके पास विश्वकोश या संदर्भ-ग्रंथ जैसी सामग्री उपलब्ध नहीं है। इसलिए उसे अपने ज्ञान के सहारे संरचना बनानी पड़ती है।
लेखक बताता है कि ए.जी. गार्डिनर के अनुसार लिखने की एक विशेष मानसिक अवस्था होती है। उस समय मन में उमंग, हृदय में स्फूर्ति और मस्तिष्क में आवेग उत्पन्न होता है, जिससे लेखन स्वाभाविक हो जाता है। ऐसे में विषय की चिंता नहीं रहती; कोई भी विषय भावों को व्यक्त करने का माध्यम बन सकता है। ‘हैट’ और ‘खूँटी’ के उदाहरण से यह विचार स्पष्ट किया गया है कि असली चीज भाव हैं, विषय केवल सहारा है।
‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उदाहरण इस बात को उजागर करता है कि निबंध में विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता होती है। जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है, वैसे ही मनोभाव व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त हो सकता है। असली वस्तु ‘हैट’ है—अर्थात लेखक के भीतर के भाव, आवेग और अनुभूति; और ‘खूँटी’ केवल माध्यम—अर्थात चुना हुआ विषय। इससे लेखन को भाव-केन्द्रित दृष्टि मिलती है।
पाठ में ‘नहमता’ और ‘अहमता’ लेखक के भीतर के दो दबावों/आवाजों के रूप में आती हैं, जो उसे अलग-अलग विषयों पर लिखने को कहती हैं। ‘नहमता’ का आदेश है कि वह ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ पर लिखे, जबकि ‘अहमता’ का आग्रह है कि वह ‘समाज-सुधार’ पर लिखे। दोनों विषय परीक्षा में आ चुके हैं और लेखक को दोनों पर आदर्श निबंध लिखकर निबंध-रचना का “रहस्य” समझाना है। यही द्वंद्व लेखन-कठिनाई बढ़ाता है।
लेखक को कठिनाई इसलिए लगती है कि यह विषय छोटा-सा प्रतीत होते हुए भी इतना विस्तार मांगता है कि पाँच पेज लिखना चुनौती बन जाता है। वह प्रश्न करता है कि क्या ‘दूर के ढोल’ वास्तव में इतने “सुहावने” हैं कि उन पर पर्याप्त सामग्री निकले। उसके पास इस विषय पर पहले से अध्ययन या संदर्भ-सामग्री नहीं है और समय भी कम है। इसलिए सामग्री-संग्रह और रूपरेखा बनाना मुश्किल दिखता है, जबकि आदर्श निबंध में क्रम और प्रभाव चाहिए।
‘समाज-सुधार’ विषय पर लेखक की कठिनाई यह है कि इसकी चर्चा अनादि काल से आज तक होती आई है और बड़े-बड़े विद्वानों में भी इस पर मतभेद हैं। ऐसे व्यापक और जटिल विषय को पाँच पेज में समेटना आसान नहीं। लेखक को चिंता होती है कि इतना विशाल विषय सीमित आकार में कैसे प्रस्तुत किया जाए, वह भी “आदर्श” निबंध के रूप में। इसलिए वह पहले निबंध-शास्त्रियों की सम्मति जानकर आदर्श विधि समझना चाहता है।
लेखक सबसे पहले यह समझना चाहता है कि “आदर्श निबंध” क्या है और उसे कैसे लिखा जाता है। वह निबंध-शास्त्रियों (आचार्यों) की रचनाएँ देखकर उनकी सम्मति जानता है, ताकि विषय चुनने और लिखने की चिंता बाद में करे। उसे निर्देश मिलते हैं कि निबंध छोटा हो, निबंध के दो प्रमुख अंग सामग्री और शैली हैं, पहले रूपरेखा बनानी चाहिए, और भाषा में प्रवाह होना चाहिए। लेकिन लेखक इन आदर्श नियमों और अपनी व्यावहारिक स्थिति में विरोध भी अनुभव करता है।
पाठ में निबंध-शास्त्रियों के कथन के अनुसार निबंध के दो प्रमुख अंग हैं—सामग्री और शैली। सामग्री का अर्थ है विचार-समूह, तथ्य या अनुभव जो विषय को पुष्ट करें; इसके लिए मनन और संग्रह आवश्यक है। शैली का अर्थ है अभिव्यक्ति का ढंग—भाषा का प्रवाह, वाक्य-विन्यास, स्पष्टता और प्रभाव। लेखक बताता है कि पहले सामग्री एकत्र कर विचार संचित करने चाहिए और फिर उपयुक्त शैली निश्चित करनी चाहिए। इन्हीं दोनों के संतुलन से निबंध सुदृढ़ बनता है।
सामग्री-संग्रह को लेकर लेखक की समस्या यह है कि उसे पहले से पता नहीं था कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ जैसे विषय पर भी निबंध लिखना पड़ेगा। यदि पहले जानकारी होती तो वह पुस्तकालय जाकर शोध/अनुसंधान कर लेता। लेकिन अब समय नहीं है और उसे “यहीं बैठकर” दो घंटे में दो निबंध तैयार करने हैं। उसके पास न विश्वकोश है, न ऐसा ग्रंथ जिसमें दोनों विषयों की सामग्री मिल सके। इसलिए उसे अपने ही ज्ञान पर भरोसा करके लिखना पड़ता है।
पाठ में विद्वानों का कथन है कि निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। रूपरेखा से विचारों का क्रम तय होता है, विषय भटकता नहीं और प्रस्तुति सुव्यवस्थित रहती है। लेकिन लेखक इसे व्यवहार में कठिन मानता है, क्योंकि उसे ‘दूर के ढोल सुहावने’ की रूपरेखा सूझती ही नहीं। वह कहता है कि निबंध लिखने के बाद तो सार कुछ वाक्यों में लिखा जा सकता है, पर पहले ही दस-पाँच शब्दों में सार या ढांचा तय करना कठिन है। यह आदर्श और व्यवहार का अंतर दिखाता है।
शैली-निर्धारण पर लेखक बताता है कि आचार्यों के अनुसार भाषा में प्रवाह होना चाहिए, वाक्य छोटे-छोटे हों और एक-दूसरे से संबद्ध हों। वह इसे सही मानता है और कहता है कि वह छोटे वाक्य लिख सकता है। लेकिन व्यंग्यात्मक ढंग से वह “मास्टर” होने का उल्लेख करता है—अपनी विद्वता दिखाने के लिए लंबे वाक्य लिखने, अस्पष्टता से गाम्भीर्य लाने, तथा अलंकार, मुहावरे और लोकोक्तियों के समावेश जैसी परंपरागत अपेक्षाओं की ओर संकेत करता है। इससे शैली को लेकर दुविधा बनती है।
पाठ में अस्पष्टता और ‘दुबोधता’ का उल्लेख व्यंग्य और आलोचनात्मक संदर्भ में आता है। लेखक बताता है कि कुछ लोग मानते हैं कि वाक्यों में अस्पष्टता होने से गाम्भीर्य आता है, और उदाहरण के रूप में संस्कृत कवि श्रीहर्ष तथा सेनापति का संदर्भ दिया गया है कि उन्होंने जान-बूझकर रचनाएँ दुबोध बना दीं। लेखक इस प्रवृत्ति पर प्रश्न खड़ा करता है कि क्या निबंध में सचमुच ऐसी अस्पष्टता आवश्यक है। इससे विद्यार्थी स्पष्ट, प्रभावी भाषा और अनावश्यक जटिलता के अंतर को समझते हैं।
पाठ में बताया गया है कि अंग्रेजी निबंधकारों ने एक दूसरी पद्धति अपनाई, जिसके जन्मदाता मोंतेन माने जाते हैं। मोंतेन ने जो कुछ स्वयं देखा, सुना और अनुभव किया, उसे ही निबंधों में लिखित रूप दिया। ऐसे निबंध मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं—इनमें न कवि की उदात्त कल्पना का प्रदर्शन होता है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि, न विद्वानों जैसी भारी विवेचना। इनकी विशेषता लेखक की सच्ची अनुभूति, सच्चे भावों की अभिव्यक्ति और उल्लास है।
मोंतेन की अनुभव-आधारित पद्धति लेखक के लिए यह निर्णय लेने का आधार बनती है कि वह भी स्वच्छंद, अनुभव-प्रधान लेखन की ओर बढ़ सकता है। पाठ के अभ्यास प्रश्न में भी संकेत है कि इस पद्धति का सार ‘अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना’ है। लेखक परंपरागत कसौटियों को पूरी तरह नकारता नहीं, पर वह देखता है कि अंग्रेजी साहित्य में ऐसी पद्धति को मान मिला है। इसलिए वह सोचता है कि अपने दृष्टिकोण से दुनिया देखकर, भावों के सहारे लिखना भी प्रभावी हो सकता है—विशेषकर जब समय कम हो।
अमीर खुसरो की कथा का उपयोग लेखक एक साथ कई विषयों को साधने की युक्ति दिखाने के लिए करता है। कथा में चार स्त्रियाँ अलग-अलग विषयों (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) पर कविता सुनना चाहती हैं और खुसरो एक ही पद्य में सबकी इच्छा पूरी कर देते हैं—“खशीर पकाई जतन से…”। लेखक कहता है कि उसमें खुसरो जैसी प्रतिभा नहीं, लेकिन उनकी विधि अपनाने से उसकी कठिनाई आधी हो जाती है। वह एक ही निबंध में ‘दूर के ढोल’ और ‘समाज-सुधार’ दोनों का समावेश करने का निश्चय करता है।
पाठ में ‘दूर के ढोल सुहावने’ का अर्थ ध्वनि-अनुभव और मनोविज्ञान के माध्यम से खुलता है। लेखक बताता है कि ढोल की कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती; पास बैठे लोगों के कानों पर तीखापन पड़ता है, पर दूर नदी-तट पर वही शब्द मधुर लग सकते हैं। दूर बैठा व्यक्ति उन ध्वनियों से विवाहोत्सव, उल्लास और प्रेम का चित्र मन में बना लेता है। यानी दूरी वास्तविक कठोरता को ढँक देती है और कल्पना मधुरता भर देती है। इस तरह लोकोक्ति जीवन की अनुभूति-भिन्नता बताती है।
लेखक ढोल की ध्वनि के उदाहरण से दिखाता है कि निकट और दूर का अनुभव अलग होता है। पास बैठे लोगों के कानों के परदे “फटते” रहते हैं—अर्थात कर्कशता तीव्र लगती है। जबकि दूर बैठे किसी व्यक्ति के लिए वही ध्वनि संध्या समय मधुरता का संचार कर सकती है और वह उसे उत्सव, आनंद और प्रेम-संगीत से जोड़ देता है। इसके बाद लेखक सामान्य नियम बताता है कि दूर रहने से यथार्थ की कठोरता का अनुभव नहीं होता। यह विचार लोकोक्ति के मर्म को स्पष्ट करता है।
पाठ में तरुण और वृद्ध की तुलना इस आधार पर की गई है कि दोनों वर्तमान से असंतोष रखते हैं, पर कारण भिन्न हैं। लेखक कहता है कि जो तरुण जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार बड़ा मनमोहक लगता है; और जो वृद्ध हो गए हैं, उन्हें अतीत की स्मृति सुखद लगती है। तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल होता है, वृद्धों के लिए अतीत। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं, वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। अभ्यास प्रश्न के अनुसार यह तुलना “अभिलाषा और अनुभव” पर आधारित समझी जाती है।
लेखक के अनुसार मानव-इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं रहा जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और उनके साथ नए-नए सुधार भी होते हैं। सुधारों का अंत नहीं होता, जैसे दोषों का भी अंत नहीं। जो बातें कभी सुधार मानी जाती थीं, वे समय के साथ दोष भी मानी जा सकती हैं और फिर उनका नया सुधार किया जाता है। इसी निरंतर परिवर्तन के कारण जीवन को “प्रगतिशील” माना गया है, और वर्तमान काल अक्सर सुधारों का काल बन जाता है।
पाठ में समाज-सुधार की व्यापकता दिखाने के लिए कई महापुरुषों/सुधारकों का उल्लेख आता है—बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी। लेखक इन्हें उदाहरण के रूप में इसलिए लाता है ताकि यह सिद्ध हो सके कि सुधार हर युग में होते आए हैं और समाज-सुधार कोई नया विचार नहीं। साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि सुधारकों की गणना केवल बड़े नामों तक सीमित नहीं; नगर-नगर और गाँव-गाँव में सुधारक दल होते हैं।
यह निष्कर्ष लेखक के तरुण-वृद्ध दृष्टिकोण और समय-परिवर्तन की व्याख्या से निकलता है। तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं, जबकि वृद्ध अतीत-गौरव के रक्षक होते हैं और अतीत को वर्तमान में खींचकर देखना चाहते हैं। इन दोनों प्रवृत्तियों के टकराव से वर्तमान सदैव “कुब्ध” रहता है—अर्थात बेचैन और परिवर्तनशील। क्योंकि असंतोष और टकराव परिवर्तन को जन्म देते हैं, इसलिए वर्तमान समय में लगातार सुधारों की मांग और प्रक्रिया चलती रहती है।
पाठ-परिचय में बताया गया है कि इस निबंध की शैली आत्मपरक है, जिसमें लेखक स्वयं पाठकों से संवाद करता है। इसका अर्थ है कि लेखक अपने अनुभव, कठिनाइयों और विचारों को ‘मैं’ के माध्यम से ईमानदारी से रखता है, जिससे पाठ जीवंत बनता है। यह शैली लेखन को आत्मीय और प्रभावशाली बनाती है, क्योंकि पाठक लेखक की सोच-प्रक्रिया को भीतर से देख पाते हैं—जैसे विषय चुनने की उलझन, सामग्री की कमी, रूपरेखा की कठिनाई और अंत में समाधान निकालने की कोशिश। छात्रों के लिए यह शैली लेखन सीखने को सहज करती है।
पाठ में लेखक अपने विचारों को प्रभावी बनाने के लिए साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भों का प्रयोग करता है। उदाहरण के लिए ए.जी. गार्डिनर के कथन से प्रेरणा-आधारित लेखन की अवधारणा आती है; शेक्सपियर और शीर्षक-करण की कठिनाई का उल्लेख रूपरेखा/शीर्षक की समस्या को रोचक बनाता है; बाणभट्ट, श्रीहर्ष, सेनापति के संदर्भ भाषा-शैली और दुबोधता की प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हैं; अमीर खुसरो की कथा एक साथ दो विषय साधने की युक्ति देती है। इन उदाहरणों से निबंध का तर्क और शैली दोनों सुदृढ़ होते हैं।
विद्यार्थी इस पाठ से निबंध लिखने की चरणबद्ध प्रक्रिया सीख सकते हैं। पाठ में संकेतित प्रक्रियाएँ हैं—विषय-चयन, प्रेरणा/उद्देश्य स्पष्ट करना, सामग्री-संग्रह (ज्ञान, अनुभव, संदर्भ), विचारों का संचित करना (मनन), रूपरेखा-निर्माण (विचार-क्रम), शैली-निर्धारण (प्रवाह, वाक्य-संबंध, भाषा की स्पष्टता), और अंत में लेखन व समापन। साथ ही यह भी सीख मिलती है कि आदर्श नियमों के बावजूद व्यावहारिक परिस्थितियाँ आती हैं, तब अनुभव-आधारित स्वच्छंद लेखन और उपयुक्त उदाहरणों से प्रभाव बढ़ाया जा सकता है।
लेखक ने दोनों विषयों को एक ही निबंध में इसलिए समाहित किया क्योंकि उसके पास समय बहुत कम था और उसे दो घंटे में दो निबंध तैयार करने थे। सामग्री-संग्रह के साधन भी उपलब्ध नहीं थे—न विश्वकोश, न संदर्भ-ग्रंथ। इसी बीच उसे अमीर खुसरो की कथा याद आती है, जहाँ एक ही पद्य में कई इच्छाएँ पूरी कर दी जाती हैं। लेखक स्वीकार करता है कि उसमें वैसी प्रतिभा नहीं, पर विधि अपनाने से कठिनाई “आधी” रह जाती है। इसलिए वह एक निबंध में ‘दूर के ढोल’ और ‘समाज-सुधार’ दोनों का समावेश कर देता है।
‘क्या लिखूँ?’ शीर्षक सीधे लेखक की केंद्रीय समस्या व्यक्त करता है—विषय और प्रस्तुति को लेकर असमंजस। लेखक के सामने दो परीक्षा-उन्मुख विषय हैं, दोनों पर “आदर्श” निबंध लिखना है, पर उसके पास न पर्याप्त समय है न तैयार सामग्री। वह निबंध-शास्त्रियों के नियमों (छोटा निबंध, सामग्री-शैली, रूपरेखा, प्रवाह) और अपनी व्यावहारिक स्थिति के बीच फँस जाता है। इस दुविधा में वह लगातार प्रश्न करता है—कैसे लिखूँ, किस ढंग से लिखूँ, और किस आधार पर लिखूँ। इसी प्रश्नात्मक मनःस्थिति को शीर्षक संक्षेप में पकड़ लेता है।
पाठ-परिचय के अनुसार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य में कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार और हास्य-व्यंग्यकार के रूप में प्रसिद्ध हैं और निबंध-लेखन के लिए विशेष रूप से स्मरणीय हैं। उनके लेखन में अध्यात्म, समाज-सुधार और लोकजीवन को प्रमुखता मिलती है। उन्होंने भारतीय कृषि और सामाजिक संबंधों का तार्किक मूल्यांकन व विश्लेषण किया तथा उनकी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य साहित्य के सिद्धांतों का सामंजस्य दिखाई देता है। ‘क्या लिखूँ?’ में यही विश्लेषणात्मक दृष्टि और आत्मपरक, संवादात्मक शैली स्पष्ट रूप से उभरती है।