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मैं और मेरा देश

‘मैं और मेरा देश’ (गंगा, हिंदी, कक्षा 9) में व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को स्पष्ट किया गया है। निबंध नागरिक के अधिकार–कर्तव्य, राष्ट्र की उन्नति में योगदान, तथा ‘शक्तिबोध’ और ‘सौंदर्यबोध’ को मजबूत करने जैसे व्यावहारिक संदेश देता है।

Summary, practice, and revision

Author: कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

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मैं और मेरा देश Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

More about chapter "मैं और मेरा देश"

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का निबंध ‘मैं और मेरा देश’ यह स्थापित करता है कि व्यक्ति की पूर्णता केवल उसकी निजी दुनिया (घर–पड़ोस–नगर) तक सीमित नहीं, बल्कि परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र की पहचान से भी जुड़ी है। लेखक दिखाते हैं कि हमारे हर कार्य का प्रभाव हमारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के साथ-साथ देश की प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है; इसलिए देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हैं। निबंध में लेखक के मन में आया ‘मानसिक भूकंप’ (लाला लाजपत राय के अनुभव से प्रेरित) यह बोध कराता है कि यदि देश पराधीन/कमज़ोर हो, तो व्यक्ति का वैभव भी गौरव नहीं दे सकता। आगे लेखक आम नागरिक की भूमिका समझाते हैं—छोटे कार्य भी भावनात्मक शुद्धता और जिम्मेदारी से बड़े बन जाते हैं। जापान की घटनाएँ बताती हैं कि एक नागरिक देश का गौरव बढ़ा भी सकता है और गलत आचरण से कलंक भी लगा सकता है। अंत में लेखक देश की उन्नति के लिए ‘शक्तिबोध’ (आत्मविश्वास) और ‘सौंदर्यबोध’ (स्वच्छता, शिष्टता, संस्कृति) की रक्षा पर बल देते हैं तथा निष्पक्ष, समझदारीपूर्ण चुनाव को देश की उच्चता की कसौटी मानते हैं।

कक्षा 9 हिंदी (गंगा) अध्याय: मैं और मेरा देश — सार, प्रश्नोत्तर, महत्वपूर्ण बिंदु

कक्षा 9 हिंदी गंगा का अध्याय ‘मैं और मेरा देश’ पढ़ें: व्यक्ति-राष्ट्र संबंध, नागरिक के अधिकार व कर्तव्य, राष्ट्र की उन्नति में योगदान, संविधान/चुनाव का महत्व, शक्तिबोध-सौंदर्यबोध और राष्ट्रीय आत्मगौरव—सार व 25 FAQs सहित।

इस निबंध का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति और राष्ट्र का संबंध अविभाज्य है। लेखक के अनुसार व्यक्ति की पूर्णता केवल उसकी निजता में नहीं होती; वह परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र की पहचान से जुड़कर ही पूरी होती है। इसलिए व्यक्ति द्वारा किया गया हर कार्य उसकी व्यक्तिगत पहचान के साथ-साथ देश की छवि को भी प्रभावित करता है। इसी आधार पर लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हैं; नागरिक का आचरण देश की प्रतिष्ठा बढ़ा भी सकता है और घटा भी सकता है।
लेखक बताता है कि वह घर में जन्मा, पड़ोस में खेला, नगर के समाज से संपर्क पाया, ज्ञान-भंडार का उपयोग किया और दूसरों की सेवाएँ लेकर तथा अपनी सेवाएँ देकर एक ‘भरा-पूरा’ मनुष्य बना। वह मानने लगा कि अब उसमें कोई अपूर्णता नहीं रही। लेकिन आगे उसे समझ आता है कि घर–पड़ोस–नगर की सीमाओं में रहते हुए भी उसकी स्थिति ‘सीमित’ है, क्योंकि किसी भी स्थान पर उसका अपमान हो सकता है और उसे न्याय/रक्षा का भरोसा चाहिए। इससे लेखक बताता है कि पूर्णता राष्ट्र से जुड़कर ही सार्थक होती है।
निबंध में स्पष्ट कहा गया है कि देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हैं। नागरिक का आचरण, बोलचाल और व्यवहार उसके अपने मान-सम्मान के साथ-साथ देश की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करता है। लेखक उदाहरणों से दिखाते हैं कि किसी एक नागरिक का अच्छा कार्य देश का गौरव बढ़ा देता है, जबकि गलत कार्य देश के मस्तक पर कलंक बन सकता है। इसलिए नागरिक का कर्तव्य है कि वह ऐसा कोई काम न करे जिससे देश की स्वतंत्रता, शक्ति या सम्मान को धक्का पहुँचे।
‘आनंद की दीवार में दरार’ लेखक के भीतर आए उस परिवर्तन का संकेत है जब उसे लगता है कि घर–पड़ोस–नगर से मिली सुविधाओं के बावजूद उसकी स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। वह समझता है कि उसकी जिंदगी की ‘दीवार’ मानसिक विचारों की बनी थी, जिसमें एक ‘मानसिक भूकंप’ से दरार पड़ी। इस दरार का अर्थ यह है कि केवल निजी सुख-सुविधाओं से पूर्णता नहीं आती; राष्ट्रीय सम्मान, अधिकारों की सुरक्षा और देश की शक्ति से जुड़ाव भी जरूरी है। यही बोध लेखक को व्यापक नागरिक-चेतना की ओर ले जाता है।
लेखक के मन में ‘मानसिक भूकंप’ एक तेजस्वी पुरुष के अनुभव से आया—पंजाब-केसरी लाला लाजपत राय। लेखक बताता है कि यह भूकंप किसी प्रदेश में नहीं, उसके मन में उठा। लाजपत राय ने विदेश-यात्रा के बाद कहा कि जहाँ भी वे गए, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक उनके माथे पर लगा रहा। यह अनुभव लेखक को झकझोर देता है और उसे समझ आता है कि यदि देश पराधीन या कमजोर हो, तो व्यक्ति को दुनिया के उपहार भी गौरव नहीं दे सकते।
लाला लाजपत राय के अनुभव से लेखक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि व्यक्ति का गौरव उसके देश की स्थिति से गहराई से जुड़ा होता है। यदि देश गुलाम या किसी भी रूप में ‘हीन’ हो, तो व्यक्ति के पास चाहे कितने भी साधन और सुविधाएँ हों, उन्हें सच्चा सम्मान और आत्मगौरव नहीं मिल सकता। इसी छाया में लेखक अपना कर्तव्य मानते हैं कि वे ऐसा कोई काम न करें जिससे देश की स्वतंत्रता, सम्मान या शक्ति को नुकसान पहुँचे, और नागरिक के रूप में उन्हें देश की शक्तियों से सम्मान-रक्षा का भरोसा भी मिलना चाहिए।
निबंध में लेखक कहता है कि नागरिक के रूप में उसका अधिकार है कि उसे देश के सम्मान का ‘पूरा-पूरा भाग’ मिले और देश की शक्तियों से उसके सम्मान की रक्षा का भरोसा रहे, जहाँ भी वह हो। लेखक पहले अपनी सीमित स्थिति का अनुभव बताता है—कि कोई उसे अपमानित कर सकता है और वह बदला लेने या अपील करने में भी असहाय महसूस कर सकता है। इसके विपरीत, राष्ट्र से जुड़कर नागरिक को सुरक्षा, सम्मान और न्याय की अपेक्षा तथा अधिकार मिलते हैं। इसलिए अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ चलते हैं।
लेखक नागरिक का कर्तव्य यह मानते हैं कि वह कोई ऐसा काम न करे जिससे देश की स्वतंत्रता या सम्मान को धक्का पहुँचे और देश की किसी भी प्रकार की शक्ति में कमी आए। वह यह भी कहते हैं कि हर नागरिक देश के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है, बशर्ते वह देश के ‘शक्तिबोध’ और ‘सौंदर्यबोध’ को हानि न पहुँचाकर उन्हें सशक्त करे। लेखक के अनुसार कर्तव्य केवल बड़े कामों तक सीमित नहीं; छोटे-छोटे व्यवहार—बोलचाल, स्वच्छता, और जिम्मेदारी—भी देश के हित में कर्तव्य बन जाते हैं।
लेखक के अनुसार देश को सबसे पहले और सबसे ज्यादा दो बातों की जरूरत है—‘शक्तिबोध’ और ‘सौंदर्यबोध’। शक्तिबोध का आशय है देश के प्रति आत्मविश्वास और सामूहिक मानसिक बल, जिसे निराशावादी तुलना और लगातार नकारात्मक चर्चा कमजोर कर देती है। सौंदर्यबोध का अर्थ है स्वच्छता, शिष्टता, रुचि और संस्कृति की रक्षा—जैसे सार्वजनिक स्थानों को गंदा न करना, अशिष्ट भाषा/भाव न रखना, और कुरुचि को बढ़ावा न देना। लेखक कहता है कि हमारा कोई भी काम देश में कमजोरी या कुरुचि की भावना को बल न दे।
लेखक स्पष्ट करता है कि देश के लिए योगदान केवल बड़े वैज्ञानिक, धनी या महान व्यक्ति ही नहीं दे सकते। जीवन में अनेक भूमिकाएँ होती हैं; ‘युद्ध’ में लड़ने वालों के साथ रसन पहुँचाने वालों और ‘जय बोलने वालों’ का भी महत्व होता है। इसी तरह एक साधारण नागरिक भी देश के सम्मान की रक्षा के लिए बहुत कुछ कर सकता है—अपने व्यवहार, बोलचाल, स्वच्छता और जिम्मेदार कार्यों से। लेखक मानता है कि कार्य की विशालता नहीं, उसके पीछे की भावना महत्व रखती है; इसलिए छोटे-छोटे अच्छे कार्य भी देशहित में बड़े बन जाते हैं।
निबंध के अनुसार स्वामी रामतीर्थ जापान में रेल-यात्रा कर रहे थे और उन्हें खाने को फल नहीं मिले। उन्होंने कहा कि जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते। प्लेटफॉर्म पर खड़े एक जापानी युवक ने यह सुन लिया, अपनी बात बीच में छोड़कर दौड़ा और ताजे फलों की टोकरी लेकर आया। उसने फल स्वामी जी को भेंट किए। यह घटना दिखाती है कि उस युवक ने अपने देश के गौरव की रक्षा के लिए तुरंत जिम्मेदारी ली, ताकि जापान के बारे में गलत धारणा न बने।
जापानी युवक ने फलों का कोई पैसा नहीं लिया। बहुत आग्रह करने पर उसने ‘मूल्य’ यह माँगा कि स्वामी रामतीर्थ अपने देश जाकर किसी से यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। इसका अर्थ यह है कि युवक का उद्देश्य व्यापार नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आत्मगौरव और देश की छवि की रक्षा थी। लेखक बताता है कि इस एक छोटे से कार्य से उस युवक ने अपने देश का गौरव कितना बढ़ा दिया। यह उदाहरण नागरिक की जिम्मेदारी और राष्ट्र-प्रतिनिधित्व को स्पष्ट करता है।
दूसरी घटना में एक विदेशी युवक जापान के सरकारी पुस्तकालय से दुर्लभ चित्रों वाली पुस्तक लाता है, चित्र निकालकर पुस्तक वापस कर देता है। पकड़े जाने पर उसे जापान से निकाल दिया जाता है, और आगे बढ़कर पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लगा दिया जाता है कि उस देश का कोई निवासी अब पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता। लेखक इस घटना से समझाता है कि एक नागरिक का गलत आचरण केवल उसके व्यक्तिगत स्तर पर नहीं रुकता; वह पूरे देश की छवि पर कलंक लगा सकता है और दूसरे नागरिकों को भी अपमान/प्रतिबंध झेलना पड़ सकता है।
निबंध में जापान की दोनों घटनाएँ इस बात को सिद्ध करती हैं। पहली घटना में एक जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ की जरूरत पूरी करके देश का गौरव बढ़ाया; दूसरी में एक विदेशी युवक की चोरी से उसके देश की छवि खराब हुई और उस देश के सभी नागरिकों पर पुस्तकालय-प्रवेश का प्रतिबंध लगा। लेखक निष्कर्ष देता है कि हर नागरिक देश के साथ बँधा है—देश की हीनता और गौरव का फल केवल उसे नहीं मिलता, उसका प्रभाव देश पर भी पड़ता है। इसलिए नागरिक का छोटा-सा काम भी राष्ट्रीय स्तर पर अर्थ रखता है।
लेखक कहता है—“मैं अपने देश का नागरिक हूँ और जानता हूँ कि मैं अपना देश हूँ।” इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति और देश दो अलग चीजें नहीं हैं; नागरिक की पहचान, सम्मान और आचरण देश की पहचान से जुड़ा है। जैसे वह अपने लाभ और सम्मान के लिए छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देता है, वैसे ही उसे देश के लाभ और सम्मान के लिए भी ध्यान देना चाहिए—यह उसका कर्तव्य है। और जैसे वह अपने जीवन में अपने साधनों से सहारा पाता है, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाना उसका अधिकार है।
लेखक इस कहावत को अपने अनुभव के आधार पर ‘सौ फीसदी झूठ’ बताता है। उसके अनुसार इतिहास साक्षी है कि कई बार अकेले चने ने भी भाड़ फोड़ा है—अर्थात एक व्यक्ति का प्रयास भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है। यह विचार निबंध के केंद्रीय संदेश से जुड़ा है कि नागरिक का छोटा योगदान भी देश के सम्मान और उन्नति में महत्व रखता है। लेखक ‘जय बोलने वालों’ तक के महत्व की चर्चा करके दिखाता है कि हर भूमिका आवश्यक है; इसलिए किसी भी नागरिक को स्वयं को असहाय या नगण्य नहीं समझना चाहिए।
लेखक कहता है कि दार्शनिकों ने जीवन को ‘बहुमुखी’ बताया है और उसकी अनेक धाराएँ हैं; जीवन को ‘युद्ध’ भी कहा गया है, जिसमें केवल लड़ना ही काम नहीं होता। युद्ध में रसन पहुँचाने, खेती करने, और ‘जय बोलने’ जैसे सहयोगों का भी महत्व होता है। इसका नागरिकता से संबंध यह है कि राष्ट्र-निर्माण भी सामूहिक प्रयास है। देश की उन्नति और सम्मान के लिए केवल बड़े पद वाले नहीं, बल्कि सामान्य नागरिक भी अपने हिस्से का सहयोग देकर योगदान देते हैं—अपने काम, अनुशासन, और सकारात्मक भूमिका से।
लेखक के अनुसार यदि लोग चलती रेलों, क्लबों, चौपालों जैसे स्थानों पर लगातार यह चर्चा करते रहें कि देश में यह नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा, सब गड़बड़ है, और साथ ही दूसरे देशों से तुलना करके अपने देश को ‘हीन’ और दूसरे को ‘श्रेष्ठ’ साबित करें, तो इससे देश के ‘शक्तिबोध’ को भारी चोट पहुँचती है। लेखक इसे देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास मानता है। वह महाभारत के शल्य–कर्ण उदाहरण से बताता है कि बार-बार संदेह जगाने से आत्मविश्वास टूटता है और पराजय की नींव पड़ती है।
लेखक कई रोजमर्रा के उदाहरण देता है: केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकना, घर का कूड़ा बाहर डालना, गंदे शब्दों और गंदे भावों का प्रयोग करना, इधर-उधर की बातें लगाना, घर-दफ्तर-गली गंदी रखना, होटलों/धर्मशालाओं या सार्वजनिक स्थानों के कोनों-ज़ीनों में थूकना, मेलों-रेल-खेल में अव्यवस्था और गंदगी फैलाना। लेखक पूछता है कि क्या हमारे किसी काम से ‘कुरुचि’ और ‘सौंदर्य’ को ठेस लगती है। यदि हाँ, तो हम देश के सौंदर्यबोध और संस्कृति को गहरी चोट पहुँचा रहे हैं।
निबंध में देश की उन्नति और कुशल नेतृत्वकर्ता कैसा हो—इस पर विचार किया गया है। लेखक नेतृत्व को केवल पद या शक्ति का प्रश्न नहीं मानता; वह नागरिकों की समझ, जिम्मेदारी और सही आचरण को भी नेतृत्व-निर्माण का आधार मानता है। अंत में लेखक देश की उच्चता/हीनता की कसौटी ‘चुनाव’ बताता है—जहाँ नागरिक समझदारी से तय कर सकें कि किसे वोट देना चाहिए और किसे नहीं, वहाँ शासन और नेतृत्व अधिक योग्य होगा। इसके विपरीत, उत्तेजक नारों या गलत प्रभाव में आकर वोट देने से देश की स्थिति कमजोर होती है।
लेखक कहता है कि देश की उच्चता और हीनता को मापने की कसौटी ‘चुनाव’ है। जिस देश के नागरिक यह समझते हैं कि चुनाव में किसे वोट देना चाहिए और किसे नहीं, वह देश ‘उच्च’ है। लेकिन जहाँ नागरिक गलत लोगों के उत्तेजक नारों या व्यक्तियों के गलत प्रभाव में आकर वोट देते हैं, वह देश ‘हीन’ है। इस विचार से लेखक नागरिक की जिम्मेदारी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ता है। साथ ही वह इसे नागरिक का कर्तव्य बताता है कि चुनाव में सही मनुष्य को वोट दें, और अधिकार बताता है कि उनके वोट के बिना कोई भी व्यक्ति अधिकार की कुर्सी पर न बैठे।
लेखक अधिकार और कर्तव्य को साथ रखकर देखता है। एक ओर वह कहता है कि नागरिक का कर्तव्य है कि वह देश की स्वतंत्रता, सम्मान और शक्ति को नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम न करे और देश के शक्तिबोध–सौंदर्यबोध को सशक्त करे। दूसरी ओर वह नागरिक का अधिकार मानता है कि उसे देश के सम्मान का पूरा भाग मिले और देश की शक्तियों से सम्मान-रक्षा का भरोसा रहे। इसी तरह चुनाव में सही व्यक्ति को वोट देना कर्तव्य है, और यह अधिकार भी कि उनके वोट के बिना कोई भी अधिकार की कुर्सी पर न बैठे।
लेखक कहता है कि किसी कार्य का महत्व उसकी विशालता में नहीं, उसे करने की भावना में है। बड़ा-से-बड़ा काम भी ‘हीन’ हो सकता है यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है, और छोटा-से-छोटा काम भी ‘महान’ हो सकता है यदि उसके पीछे अच्छी भावना है। इसे स्पष्ट करने के लिए लेखक तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा और बूढ़े किसान के शहद वाली घटना बताता है, जिसमें शहद की कीमत से अधिक उसके पीछे का शुद्ध प्रेम महत्वपूर्ण होता है। इसी प्रकार भारत में किसान द्वारा पंडित नेहरू को खाट भेंट करने की घटना में उपहार का मूल्य नहीं, भावना का सम्मान किया जाता है।
घटना में बूढ़ा किसान तीन मील पैदल चलकर हिट्टी की छोटी हँडिया में पाव-भर शहद उपहार लाता है। कमालपाशा, जो उस समय तुर्की के राष्ट्रपति थे, विश्राम के वस्त्र बदलने के बाद भी नीचे आकर उपहार स्वीकार करते हैं, शहद चखते हैं और तीसरी उँगली शहद में भरकर बूढ़े के मुँह में देते हैं। फिर कहते हैं कि यह सर्वोत्तम उपहार है क्योंकि इसमें बूढ़े के हृदय का शुद्ध प्यार है, और सम्मानपूर्वक उसे गाँव तक पहुँचाने का आदेश देते हैं। संदेश यह है कि उपहार की महत्ता वस्तु में नहीं, भावना में है; सम्मान देने से नागरिक–राष्ट्र का संबंध मजबूत होता है।
लेखक बताता है कि भारत में एक किसान रंगीन सुतलियों से खाट बुनकर रेल से दिल्ली लाता है और उसे अपने कंधे पर रखकर प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की कोठी पर पहुँचता है। वह केवल यह चाहता है कि नेहरू इसे स्वीकार करें; वह भाव-विभोर होकर बोल भी नहीं पाता। नेहरू उसका उपहार स्वीकार करते हैं और बदले में अपना हस्ताक्षरित फोटो स्वयं उपहार में देते हैं, जिसका मूल्य सामान्यतः बहुत बड़े लोग चाहते हैं। लेखक यह घटना इसलिए लाते हैं ताकि दिखाया जा सके कि राष्ट्र के बड़े पद पर बैठे व्यक्ति भी नागरिक की भावना का सम्मान करते हैं, और छोटे कार्य/उपहार भी राष्ट्रीय संबंध और आत्मगौरव को बढ़ाते हैं।
लेखक कहता है कि केवल ‘हाँ’ या ‘ना’ में उत्तर नहीं चलेगा; अपने कामों को देश के अनुकूल होने की ‘कसौटी’ पर कसने की आदत डालनी चाहिए। इसके लिए वह दो बुनियादी जरूरतें बताता है—देश का शक्तिबोध और सौंदर्यबोध। यदि हमारा कोई व्यवहार देश में कमजोरी की भावना को बल देता है या कुरुचि बढ़ाता है (जैसे देश को हीन बताने वाली चर्चा, गंदगी, अशिष्टता), तो वह काम देश के अनुकूल नहीं है। इसके विपरीत, जो काम आत्मविश्वास, स्वच्छता, शिष्टाचार और जिम्मेदारी बढ़ाएँ, वे देशहित में हैं।
निबंध में संस्कृति और राष्ट्र- पहचान का संबंध ‘सौंदर्यबोध’ के माध्यम से बनता है। लेखक बताता है कि स्वच्छता, रुचि, शिष्ट भाषा और सार्वजनिक व्यवहार केवल व्यक्तिगत आदतें नहीं, बल्कि देश की संस्कृति की पहचान हैं। सार्वजनिक स्थानों को गंदा करना, थूकना, अपशब्द कहना, या मेलों-रेल-खेल में अव्यवस्था फैलाना देश के सौंदर्यबोध को चोट पहुँचाता है और देश की संस्कृति पर गहरी चोट बन जाता है। इस तरह नागरिक का सांस्कृतिक आचरण राष्ट्र की पहचान और आत्मगौरव को मजबूत या कमजोर करता है।
निबंध यह संकेत देता है कि देश केवल भौगोलिक सीमाओं का नाम नहीं है, बल्कि नागरिकों की प्रतिष्ठा, संस्कृति, शक्ति और सामूहिक पहचान से मिलकर बनता है। लेखक पहले घर–पड़ोस–नगर की सीमाओं की बात करता है और फिर समझता है कि असली सुरक्षा और सम्मान का भरोसा राष्ट्र से जुड़कर आता है। आगे वह बताता है कि नागरिक जहाँ भी जाए, वह देश का प्रतिनिधि होता है; इसलिए देश का गौरव और हीनता केवल भूगोल नहीं, नागरिक आचरण और राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े अनुभव हैं। इस प्रकार भौगोलिक पहचान के साथ नैतिक और सांस्कृतिक पहचान भी अनिवार्य मानी गई है।