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रीढ़ की हड्डी

‘रीढ़ की हड्डी’ (1939) एकांकी परंपरागत विवाह व्यवस्था, दहेज/लेन-देन और “कम पढ़ी-लिखी लड़की” की माँग जैसी रूढ़ियों पर तीखा व्यंग्य करती है। उमा एक पढ़ी-लिखी, आत्मसम्मानी युवती के रूप में महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्र सोच का पक्ष रखती है।

Summary, practice, and revision

Author: जगदीशचंद्र माथुर

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रीढ़ की हड्डी Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

More about chapter "रीढ़ की हड्डी"

जगदीशचंद्र माथुर की एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ भारतीय समाज की विवाह-परंपराओं और स्त्री-शिक्षा के प्रति रूढ़िगत दृष्टि पर प्रहार करती है। कथा में रामस्वरूप (बाबू) अपनी बेटी उमा का रिश्ता तय कराने के लिए घर सजाते हैं, नाश्ता-मेहमाननवाज़ी की तैयारी करते हैं और “ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की” न चाहने वाले गोपालप्रसाद व उनके बेटे शंकर को बुलाते हैं। बातचीत में शिक्षा, सुंदरता, ‘जायचा’ और लड़कियों की सीमा तय करने वाली मानसिकता खुलकर सामने आती है। उमा सादगी से आती है, संगीत-चित्रकला जैसी कलाएँ दिखाती है, पर जब उसे वस्तु की तरह “नाप-तोल” किया जाता है तो वह दृढ़ स्वर में विरोध करती है। वह बताती है कि उसने बी.ए. किया है और शिक्षा को आत्मबल व स्वतंत्र विचार का साधन मानती है। उमा शंकर के चरित्र पर भी प्रश्न उठाती है और अंत में ‘रीढ़ की हड्डी/बैकबोन’ को आत्म-सम्मान व नैतिक दृढ़ता का प्रतीक बनाकर रूढ़ियों को चुनौती देती है।

Class 9 Hindi Ganga Chapter ‘रीढ़ की हड्डी’ (जगदीशचंद्र माथुर): सारांश, विषय-वस्तु, प्रश्नोत्तर

Class 9-12 के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी का आसान सार, मुख्य विचार, उमा का चरित्र, परंपरागत विवाह व्यवस्था, स्त्री-शिक्षा और सामाजिक रूढ़ियों पर व्यंग्य। परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर और थीम आधारित तैयारी।

इस एकांकी का मुख्य विषय परंपरागत विवाह व्यवस्था और स्त्री-शिक्षा के प्रति रूढ़िगत सोच पर व्यंग्य है। 1939 के सामाजिक संदर्भ में लड़कियों को शिक्षा और अवसर समान रूप से नहीं मिलते थे। रचना में “कम पढ़ी-लिखी लड़की” की मांग, विवाह में लेन-देन जैसी कुरीतियाँ, और लड़की को वस्तु की तरह देखकर चुनने की मानसिकता उजागर होती है। उमा पढ़ी-लिखी, सशक्त महिला का प्रतिनिधित्व करती है और आत्म-सम्मान व स्वतंत्र विचार के पक्ष में खड़ी होती है।
एकांकी में ‘रीढ़ की हड्डी’ का अर्थ केवल शरीर की हड्डी नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है। गोपालप्रसाद अपने बेटे शंकर की “बैकबोन” पर टिप्पणी करते हैं और बाद में उमा उसी शब्द को व्यंग्य बनाकर लौटाती है—“घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाड़ले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं।” यहाँ ‘बैकबोन’ का मतलब साहस, चरित्र-बल और सही बात पर खड़े होने की क्षमता से है।
यह एकांकी 1939 में लिखी गई थी। उस समय भारतीय समाज में स्त्रियों को शिक्षा और अन्य कार्यक्षेत्रों में समान अवसर सामान्यतः नहीं मिलते थे। विवाह के संदर्भ में यह धारणा प्रचलित थी कि लड़कियाँ बहुत पढ़ी-लिखी न हों, ताकि वे “बहस” न करें और घर की परंपरागत भूमिका में रहें। इसी वातावरण में एकांकी विवाह-चयन की प्रक्रिया, सुंदरता-मानदंड, ‘जायचा’ जैसी बातों और लेन-देन/कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य करती है।
उमा पढ़ी-लिखी और सशक्त महिला का प्रतिनिधित्व करती है। वह बी.ए. पास है, संगीत और कला जानती है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण उसका आत्म-सम्मान और स्वतंत्र विचार है। जब गोपालप्रसाद उसे चुप रहने, “मुंह खोलने” और वस्तु की तरह परखने की स्थिति में रखते हैं, तो उमा दृढ़ता से विरोध करती है। वह कहती है कि लड़की कोई “कुर्सी-मेज” नहीं जिसे दुकानदार केवल दिखा दे। उमा दिखाती है कि शिक्षा केवल डिग्री नहीं, आत्मबल और स्वतंत्र सोच है।
रामस्वरूप बाहर से आधुनिक और सभ्य व्यवहार दिखाते हैं—मेहमानों के लिए कमरे की सजावट, नाश्ता, चाय, हारमोनियम-सितार की व्यवस्था करते हैं। लेकिन भीतर से वे विवाह की रूढ़ प्रक्रिया के सामने झुकते हैं और गोपालप्रसाद को यह बताकर भ्रमित करते हैं कि उमा केवल मैट्रिक तक पढ़ी है। वे जानते हैं कि गोपालप्रसाद जैसे लोग पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहते, फिर भी रिश्ता “मतलब” के लिए आगे बढ़ाते हैं। यही दिखावा बनाम रूढ़ सोच का अंतर्द्वंद्व है।
प्रेमा कहती है—“मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं… अपना जमाना अच्छा था।” इससे पता चलता है कि उस समय कई परिवारों में लड़कियों की शिक्षा को अनावश्यक या जोखिमपूर्ण माना जाता था। प्रेमा को लगता है कि अधिक पढ़ाई से लड़की “सर चढ़” जाती है और विवाह तय करना कठिन हो जाता है। वह ‘टीम-टाम’ और सजावट पर ज़ोर देती है, शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर नहीं। यह दृष्टि तत्कालीन समाज में स्त्री-शिक्षा के प्रति संकीर्ण सोच को दर्शाती है।
गोपालप्रसाद स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए, “मेम साहब” नहीं रखनी और “कौन भुगतेगा उसके नखरे।” वे मानते हैं कि लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई “एक बात नहीं” है। उनका डर है कि अगर औरतें अंग्रेज़ी अखबार पढ़ें, राजनीति पर बहस करें, तो गृहस्थी बिगड़ जाएगी। वे उदाहरण देकर पुरुष-स्त्री भूमिकाओं का भेद “स्वाभाविक” बताने की कोशिश करते हैं। यह सोच एकांकी की मुख्य रूढ़ि-आलोचना है।
शंकर को गोपालप्रसाद एक पढ़ा-लिखा युवक बताते हैं जो मेडिकल कॉलेज में है, पर उसका व्यक्तित्व कमजोर और लाचार दिखता है। मंच-निर्देश में उसकी झुकी कमर और खिसियाहट-भरी आवाज़ का उल्लेख है। वह पिता की बातों पर हँसता है और निर्णय में स्वतंत्रता नहीं दिखाता। उमा उस पर चरित्रहीन व्यवहार का आरोप लगाती है कि वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमता था और भगाया गया था। अंत में ‘बैकबोन’ का व्यंग्य शंकर की नैतिक कमजोरी दिखाता है।
शुरुआत में उमा सादगी से आती है, सिर झुकाए रहती है और कई प्रश्नों पर चुप रहती है। पिता रामस्वरूप संकेत करते हैं, खाँसते हैं, ताकि उमा ‘इनाम’ आदि के बारे में बोले, लेकिन वह मौन रहती है। यह मौन एक तरह से विरोध का संकेत भी बनता है। जब गोपालप्रसाद उसे रूखे स्वर में “ज़रा मुंह तो खोलना चाहिए” कहते हैं और उसे वस्तु की तरह परखते हैं, तब उमा अपनी बात कहने का निर्णय लेती है और आत्मसम्मान के साथ पूरे दृष्टिकोण का विरोध करती है।
एकांकी दिखाती है कि विवाह-तय करने की प्रक्रिया में लड़की को ‘खरीददार’ की नजर से देखा जाता है—उसकी चाल, चेहरा, गाना-बजाना, सिलाई, पेंटिंग, और पुरस्कार तक पूछे जाते हैं। गोपालप्रसाद का व्यवहार लड़की को इंसान नहीं, ‘चीज’ मानने जैसा है। उमा इसी पर चोट करती है कि लड़कियों के दिल होते हैं, उन्हें चोट लगती है, वे “बेबस भेड़-बकरियाँ” नहीं हैं। यह टिप्पणी महिलाओं की गरिमा, सहमति और सम्मान की आवश्यकता को केंद्र में लाती है।
उमा कहती है कि जब कुर्सी-मेज बिकती है तो दुकानदार उनसे कुछ नहीं पूछता, केवल खरीदार को दिखाता है। इस तुलना से वह विवाह-सम्बन्ध तय करने की प्रक्रिया की अमानवीयता उजागर करती है, जहाँ लड़की को बोलने और निर्णय में हिस्सेदारी का अधिकार नहीं दिया जाता। यह संवाद बताता है कि परंपरागत व्यवस्था में लड़की की भावनाएँ और इच्छाएँ गौण हैं। उमा इस उदाहरण के माध्यम से स्त्री को वस्तु मानने वाली सोच की आलोचना करती है और सम्मानजनक व्यवहार की मांग करती है।
एकांकी में शिक्षा को दो विरोधी दृष्टियों से दिखाया गया है। गोपालप्रसाद और शंकर मानते हैं कि लड़कियों की ऊँची शिक्षा गृहस्थी के लिए खतरा है और “नौकरी तो करानी नहीं” जैसी बात कहते हैं। दूसरी ओर उमा शिक्षा को आत्मबल और स्वतंत्र विचार का आधार मानती है और बताती है कि बी.ए. पास करना कोई पाप नहीं। रामस्वरूप भी भीतर से जानते हैं कि यह सोच “दकियानूसी” है, लेकिन सामाजिक दबाव में झूठ बोलते हैं।
व्यंग्य यह है कि विवाह एक मानवीय संबंध होने के बजाय ‘बिजनेस’ की तरह किया जा रहा है। गोपालप्रसाद स्वयं “बिजनेस की बातचीत” शब्द का प्रयोग करते हैं। लड़की की पढ़ाई, सुंदरता, ‘जायचा’, और घरेलू कौशल—सबको सौदे की शर्तों की तरह परखा जाता है। रामस्वरूप भी इस सौदेबाज़ी में शामिल होकर उमा की शिक्षा छिपाते हैं। उमा का विरोध इस व्यवस्था को चुनौती देता है और बताता है कि विवाह में सम्मान, सहमति और बराबरी जरूरी हैं, न कि नाप-तोल।
गोपालप्रसाद पूछते हैं कि ‘जायचा’ मिल गया होगा, और रामस्वरूप कहते हैं कि उसे ठाकुरजी के चरणों में रख दिया—“खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए।” इससे पता चलता है कि विवाह तय करने में जन्मपत्री/कुंडली को बहुत महत्व दिया जाता था। यह एक ऐसी रूढ़ि है जिसमें व्यक्ति के गुण, शिक्षा, विचार और आपसी समझ से अधिक ‘जन्म’ आधारित गणना को निर्णायक माना जाता है। एकांकी इन संकेतों के जरिए दिखाती है कि विवाह-निर्णय में तर्क और मानवता के बजाय परंपरा का दबाव चलता है।
उमा आरोप लगाती है कि शंकर पिछली फरवरी में लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द घूम रहा था और वहां से भगाया गया था। यह प्रसंग दोहरी नैतिकता दिखाता है: एक तरफ शंकर और उसके पिता “सभ्य” बनकर लड़की की शिक्षा से डरते हैं, दूसरी तरफ शंकर का व्यवहार संदिग्ध बताया जाता है। उमा इसे सामने लाकर बताती है कि चरित्र और सम्मान का दावा करने वालों की वास्तविकता अलग हो सकती है। इससे उमा का साहस और सच बोलने की क्षमता भी उभरती है।
रामस्वरूप जानते हैं कि गोपालप्रसाद जैसे लोग ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहते और अधिकतम मैट्रिक-पास की मांग करते हैं। इसलिए रिश्ता आगे बढ़ाने के लिए वे उमा के बी.ए. होने की बात छिपाते हैं और यह संकेत देते हैं कि पढ़ाई अधिक नहीं है। उनका लक्ष्य “मतलब” साधना और सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार रिश्ता तय करना है। यह छिपाव एक तरफ पिता की व्यावहारिक मजबूरी दिखाता है, दूसरी तरफ उसी रूढ़ व्यवस्था में उनकी भागीदारी भी उजागर करता है, जिसके विरुद्ध उमा खड़ी होती है।
प्रेमा कहती है कि लड़की कितनी भी सुंदर हो, बिना “टीम-टाम” कौन पूछता है; वह पाउडर सामने रखती है, पर उमा को उससे “नफरत” है। गोपालप्रसाद भी लड़की के सुंदर होने को “निहायत जरूरी” बताते हैं और कहते हैं कि चाहे पाउडर लगाए या वैसे ही। यह मानसिकता बताती है कि विवाह में लड़की की बाहरी छवि को उसकी सोच, शिक्षा और व्यक्तित्व से ऊपर रखा जाता है। एकांकी इस जोर को व्यंग्य बनाकर दिखाती है कि सुंदरता को भी एक ‘मापदंड’ बनाकर बाजारू दृष्टि अपनाई जाती है।
उमा जब पान की तश्तरी लेकर आती है तो उसका चेहरा उठते ही चश्मा दिखाई देता है और गोपालप्रसाद व शंकर एक साथ चौंकते हैं—“चश्मा!!!” यह प्रतिक्रिया बताती है कि वे शारीरिक/बाहरी संकेतों को भी “खामी” की तरह देखते हैं। रामस्वरूप तुरंत सफाई देते हैं कि पिछले महीने आंखें दुखने लगी थीं, पढ़ाई की वजह से नहीं। यह मोड़ दिखाता है कि लड़की के स्वास्थ्य, रूप और “परफेक्ट” छवि पर अनावश्यक निगाह रखी जाती है, और घरवालों को भी छिपाने-ढकने की जरूरत महसूस होती है।
रामस्वरूप उमा को “करीने” से आने, थोड़ा गाने, और मेहमानों के सामने ठीक ढंग से पेश होने को कहते हैं, ताकि रिश्ता बिगड़े नहीं। उमा पहले चुप रहती है, फिर तीखा और तर्कपूर्ण प्रतिरोध करती है। इससे पिता-बेटी के बीच दो तरह के लक्ष्य सामने आते हैं: पिता सामाजिक स्वीकृति और जल्दी रिश्ता तय करने को प्राथमिकता देते हैं, जबकि उमा सम्मान और समानता को। रामस्वरूप बार-बार “उमा, उमा!” कहकर उसे रोकते हैं, जो इस संघर्ष का संकेत है कि घर के भीतर भी स्त्री की आवाज़ दबाई जाती रही है।
दोनों में दिखावे और परंपरा के प्रति झुकाव की समानता दिखती है। गोपालप्रसाद पढ़े-लिखे, सभा-सोसाइटी में जाने वाले होने के बावजूद स्त्री-शिक्षा के खिलाफ हैं। रामस्वरूप भी आधुनिकता का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन रिश्ते के लिए उमा की शिक्षा छिपाते हैं और गोपालप्रसाद की मांगों के अनुसार माहौल बनाते हैं। दोनों बातचीत में हँसी-ठठोली, सभ्यता और मेहमाननवाज़ी दिखाते हैं, पर मूल रूप से लड़की को “देखने” और चुनने की प्रक्रिया को सामान्य मानते हैं। यही समानता एकांकी की सामाजिक आलोचना को तीखा बनाती है।
एकांकी की संवाद-शैली मुख्यतः स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण है। रोज़मर्रा की बातचीत—तख्त बिछाना, दरी-चादर, मक्खन, चाय—से वातावरण बनता है और उसी सामान्यता के बीच रूढ़ सोच के तीखे वाक्य सामने आते हैं। गोपालप्रसाद की बातें (जैसे स्त्री-शिक्षा पर तर्क) और उमा के प्रतिवाद के संवाद सीधे और प्रभावशाली हैं। “बिजनेस” शब्द, “खूबसूरती पर टैक्स” जैसी बातों से हास्य पैदा होता है, लेकिन हास्य के भीतर समाज की गंभीर समस्या पर चोट होती है।
उमा का विरोध महिलाओं की स्वतंत्रता के विमर्श को केंद्र में लाता है। वह सवाल करती है कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होते, क्या उन्हें चोट नहीं लगती, और क्या वे बेबस हैं जिन्हें कसाई खरीदते हैं। वह अपनी शिक्षा (बी.ए.) को छिपाने से इंकार करती है और कहती है कि यह कोई पाप या चोरी नहीं। साथ ही वह शंकर की कायरता और गलत नज़र/ताक-झाँक को उजागर कर पुरुष-प्रधान नैतिकता को चुनौती देती है। उसका “बैकबोन” वाला व्यंग्य स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और बराबरी के अधिकार को आवाज़ देता है।
संदर्भ में एकांकी विवाह में लेन-देन जैसी सामाजिक कुरीतियों को उजागर करने की बात कहती है। कथानक में ‘बिजनेस’ शब्द का प्रयोग, लड़की की खूबियों की सूची बनाकर पूछताछ, और विवाह-निर्णय को सौदे जैसी प्रक्रिया बनाना—ये सब उसी मानसिकता की ओर संकेत हैं जिसमें रिश्ता मानवीय संबंध नहीं, लेन-देन/शर्तों का मामला बन जाता है। गोपालप्रसाद का “बात साफ है” कहकर मांगें रखना भी इसी प्रवृत्ति का रूप है। उमा का प्रतिवाद इस ‘बाजारू’ दृष्टि पर नैतिक चोट करता है।
अंत में उमा का मौन “सिसकियों” में बदल जाता है। यह दिखाता है कि साहस से सच बोलने के बावजूद सामाजिक टकराव और घर के भीतर तनाव उसे भावनात्मक रूप से प्रभावित करता है। उसने अपमानजनक प्रक्रिया का विरोध किया, पर उसी के साथ रिश्ते टूटने, पिता की नाराज़गी और समाज के दबाव का भार भी झेला। यह दृश्य बताता है कि आत्मसम्मान की लड़ाई केवल तर्क की नहीं, भावनाओं की भी होती है। उमा की सिसकियाँ उस व्यवस्था की चोट को दिखाती हैं जो स्त्री को चुप रहने और सहने की अपेक्षा करती है।
अंत में रतन का “बाबूजी, मक्खन!” कहना और परदा गिर जाना व्यंग्यात्मक प्रभाव पैदा करता है। पूरी एकांकी में मक्खन की कमी/व्यवस्था पर बार-बार बातचीत होती है, मानो घर की तैयारी और दिखावा सबसे जरूरी हो। लेकिन उसी बीच उमा का बड़ा संघर्ष और सामाजिक मुद्दा सामने आ जाता है। जब रिश्ता टूट चुका है, उमा रो रही है, तब मक्खन का आना एक कटाक्ष बन जाता है—जैसे छोटी व्यवस्थाएँ समय पर आ गईं, पर सोच की “कमी” बनी रही। यह अंत हास्य के साथ गंभीर सामाजिक टिप्पणी करता है।
उमा के अनुसार शिक्षा का सही अर्थ आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना है। वह कहती है कि बी.ए. पास करना कोई पाप नहीं, न चोरी है। शिक्षा उसे अपने मान-सम्मान का बोध देती है और अन्याय के खिलाफ बोलने का साहस देती है। एकांकी के अभ्यास-प्रश्नों में भी संकेत है कि उमा शिक्षा को केवल डिग्री, नौकरी या किसी को प्रसन्न करने का साधन नहीं मानती। उसके लिए पढ़ाई का मूल्य यह है कि व्यक्ति अपने अधिकार समझे, तर्क कर सके और स्वयं को वस्तु बनने से बचा सके।
सामाजिक रूढ़ियाँ कई उदाहरणों से स्पष्ट होती हैं—ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की न चाहना, पुरुष-स्त्री की भूमिकाओं को “प्राकृतिक” बताकर सीमित करना, सुंदरता और सजावट को विवाह की शर्त बनाना, ‘जायचा’ पर जोर देना, और लड़की से बोलने की अपेक्षा न करना। गोपालप्रसाद का कथन कि अगर औरतें राजनीति पर बहस करें तो गृहस्थी खत्म हो जाएगी, इसी रूढ़ि का मजबूत उदाहरण है। प्रेमा का शिक्षा को “जंजाल” कहना भी रूढ़ सोच दिखाता है। उमा का प्रतिवाद इन रूढ़ियों को चुनौती देता है।
उमा का विरोध महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पहली बार उस ‘सामान्य’ मानी जाने वाली प्रक्रिया को अस्वीकार करती है जिसमें लड़की चुप रहकर परखी जाती है। वह खरीदार-बिकाऊ वाली मानसिकता पर सवाल उठाती है, अपनी शिक्षा छिपाने से इंकार करती है और पुरुष-पक्ष के चरित्र पर भी प्रश्न करती है। इससे विवाह को केवल सामाजिक सौदा मानने वाली परंपरा हिलती है। उमा का “बैकबोन” वाला व्यंग्य बताता है कि नैतिक दृढ़ता केवल पुरुषों की जागीर नहीं; स्त्री भी सम्मान के लिए खड़ी हो सकती है। यही संदेश इस एकांकी को आज भी प्रासंगिक बनाता है।