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सं वादहीन

कक्षा 9 हिंदी (गंगा) की कहानी ‘संवादहीन’ ग्रामीण वृद्ध स्त्री ताई के अकेलेपन और संवाद की आवश्यकता को संवेदनशील ढंग से दिखाती है। ताई और तोते ‘श्मट्ठू’ के स्नेहपूर्ण रिश्ते, संघर्ष, और परिवार के अभाव से उपजा मौन इस पाठ का केंद्र है।

Summary, practice, and revision

Author: शेखर जोशी

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सं वादहीन Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

More about chapter "सं वादहीन"

‘संवादहीन’ शेखर जोशी की कहानी है, जो गाँव के बीच स्थित बड़े, अब सूने पड़ चुके घर में रहने वाली वृद्ध ताई के अकेलेपन को सामने लाती है। कभी वैभव, परिवार, नौकर-चाकर और खेती-कारबार से भरा जीवन अब पलायन और बिखराव के कारण खाली हो गया है। ऐसे में गणपत एक पहाड़ी तोता ‘श्मट्ठू’ ले आता है, जो ताई के लिए केवल पक्षी नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र बन जाता है। ताई-श्मट्ठू के बीच कभी प्रेमभरे संवाद होते हैं तो कभी हल्की नोक-झोंक, पर दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। कुम्भ-स्नान के लिए ताई जब प्रयागराज जाती है, तो जगन मास्टर की पत्नी श्मट्ठू को अपने पास रखती है। आदर्शवादी जगन मास्टर को पिंजरे में बंद पक्षी की पीड़ा खलती है; वे उसे रोज़ थोड़ी देर आज़ादी देते हैं और एक दिन श्मट्ठू रोशनदान से उड़ जाता है। ताई के लौटने से पहले गाँव वाले श्मट्ठू जैसा दूसरा तोता ले आते हैं, पर ताई का ‘संवाद’ फिर भी टूट जाता है—यही कहानी की करुण, यथार्थवादी कसक है।

संवादहीन (शेखर जोशी) कक्षा 9 हिंदी गंगा: सारांश, थीम, पात्र, प्रश्न-उत्तर

कक्षा 9 हिंदी (गंगा) की कहानी ‘संवादहीन’—ताई और तोता श्मट्ठू के रिश्ते के माध्यम से अकेलापन, परिवार का अभाव, संवाद की जरूरत और स्वतंत्रता बनाम बंधन का यथार्थ। यहाँ सारांश, थीम, पात्र-विश्लेषण और महत्वपूर्ण FAQs पढ़ें।

‘संवादहीन’ का मुख्य विषय ग्रामीण वृद्ध स्त्री ताई का अकेलापन और जीवन में संवाद की आवश्यकता है। ताई का बड़ा घर कभी भरा-पूरा था, पर बहू-बेटों के शहर चले जाने और बेटियों के अपने-अपने घर बसाने से घर सूना रह गया। ऐसे वातावरण में तोता ‘श्मट्ठू’ ताई के लिए केवल पालतू पक्षी नहीं रहता, बल्कि बातचीत, अपनापन और सहारे का माध्यम बन जाता है। कहानी समकालीन जीवन की विसंगतियों—पलायन, अकेलापन और आदर्श-यथार्थ के द्वंद्व—को भी उजागर करती है।
कहानी की पृष्ठभूमि एक गाँव है, जहाँ गाँव के बीच स्थित ताई का बड़ा घर अब ‘सूना खंडहर’ जैसा हो गया है। पहले इसी घर में पुत्र-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, खेती-बाड़ी और कारबार की रौनक थी, लेकिन समय के साथ परिवार बिखर गया और घर में सन्नाटा भर गया। इसी सूनेपन में ताई और तोता श्मट्ठू एक-दूसरे के सहारे रहते हैं। आगे की घटनाएँ जगन मास्टर के घर, पिंजरे, कमरे और रोशनदान के आसपास घटती हैं, जो ‘आज़ादी बनाम बंधन’ का संकेत देती हैं।
ताई के अकेलेपन का मूल कारण परिवार से दूरी और संवाद का अभाव है। कहानी में बताया गया है कि बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों में बस गए, बेटियाँ अपने-अपने घर में रम गईं, और धीरे-धीरे घर-कारबार सब पराए हाथों में चला गया। खेती-बाड़ी और कारबार नहीं रहे तो नौकर-चाकर भी टिक नहीं पाए। ताई पेट की समस्या से ज्यादा सूने घर की ‘भाँय-भाँय’ से परेशान रहती हैं। यही सामाजिक स्थिति—पलायन और परिवार का बिखराव—उनके जीवन में गहरे अकेलेपन को जन्म देता है।
श्मट्ठू ताई के लिए इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वह उनके अकेलेपन में संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र बन गया था। गणपत द्वारा लाया गया यह पहाड़ी तोता ताई के पढ़ाए शब्द दोहराता, सवालों के जवाब देता और घर में रौनक भर देता था। ताई उसे दाल-भात बनाकर खिलातीं, रोटी बचाकर रखतीं, और उसकी जरूरतों के प्रति बेहद सतर्क रहतीं। श्मट्ठू की बातचीत से ताई को अपनापन, स्नेह और सहारा मिलता है। इसलिए उसका वियोग ताई के लिए केवल पक्षी का खोना नहीं, बल्कि संवाद का टूट जाना है।
ताई और श्मट्ठू के संबंध में मुख्य रूप से ममता और स्नेह दिखाई देते हैं, साथ ही कभी-कभी नोक-झोंक भी। ताई श्मट्ठू को ‘बेटा’ कहकर आशीष देती हैं—“जीते रहो बेटा, जुग-जुग जिओ”—और श्मट्ठू भी “खुश रहो!” कहकर प्रतिक्रिया देता है। ताई के थकने पर भी श्मट्ठू उन्हें दिलासा देता—“कटेगी! कटेगी!!”। पर जब श्मट्ठू पानी-दाने की कटोरियाँ उलट देता, ताई खीझकर “मर जा!” कह देतीं और श्मट्ठू वही दोहरा देता। फिर मान-मनौवल से रिश्ता सामान्य हो जाता है।
कहानी में संवाद की अनुपस्थिति दो स्तरों पर उभरती है। पहला, ताई के पारिवारिक जीवन में: परिवार के सदस्य शहर चले गए, बेटियाँ अलग हो गईं, और ताई के पास बोलने-सुनने वाला कोई नहीं बचा। दूसरा, कहानी के अंत में: असली श्मट्ठू उड़ जाता है और उसकी जगह लाया गया ‘एवजी’ (स्थानापन्न) तोता ताई को देखकर वही परिचित प्रतिक्रिया नहीं देता। ताई उसे पुकारकर थक जाती हैं, पर संवाद लौटता नहीं। शीर्षक ‘संवादहीन’ इस टूटे हुए संवाद और बढ़ते मौन का प्रतीक बनता है।
यह वाक्य ताई की गहरी चिंता, असहायता और जीवन-संघर्ष का संकेत देता है। ताई ‘नैया’ शब्द से अपने जीवन की स्थिति की ओर इशारा करती हैं—बुढ़ापा, घर का सूना पड़ जाना, परिवार का साथ न रहना और भविष्य की अनिश्चितता। जैसे नदी पार करना कठिन होता है, वैसे ही अकेले जीवन को आगे बढ़ाना भी कठिन लग रहा है। इसी क्षण श्मट्ठू उनके प्रश्न के जवाब में “राम-राम कहो, सीताराम कहो” दोहराता है, जिससे ताई को सांत्वना और संवाद का सहारा मिलता है।
गणपत की भूमिका कहानी में सहायक और निर्णायक दोनों है। शुरुआत में वही ताई के सूनेपन को सहारा देने के लिए कहीं से एक प्यारा पहाड़ी तोता ले आता है। श्मट्ठू के आने से ताई का जीवन बदलता है और घर में रौनक लौटती है। आगे जब श्मट्ठू जगन मास्टर के घर से उड़ जाता है और ताई के लौटने का समय नजदीक आता है, तब गाँव वालों की चिंता के बीच गणपत ही सुझाव देता है कि श्मट्ठू जैसी सूरत का दूसरा तोता लाकर ताई को भ्रम में रखा जाए। इस तरह गणपत घटनाओं को मोड़ देने वाला पात्र है।
जगन मास्टर का व्यक्तित्व आदर्शवादी, नैतिक और स्वतंत्र विचारों वाला है। वे कुछ नियम-सिद्धांत बनाकर चलते हैं और कोशिश करते हैं कि उनके कारण किसी को कष्ट न हो। पिंजरे में बंद श्मट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होती है; वे इसे ‘पाप’ मानते हुए प्रायश्चित की तरह उसे थोड़ी देर खुली हवा में आने का अवसर देते हैं। वे दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते। हालांकि इसी आदर्शवाद के परिणामस्वरूप श्मट्ठू रोशनदान से उड़ जाता है, जिससे कहानी में ‘आदर्श बनाम यथार्थ’ का द्वंद्व उभरता है।
जगन मास्टर ने श्मट्ठू को इसलिए बाहर निकाला क्योंकि उन्हें पिंजरे में बंद पक्षी की यातना असह्य लगती थी और वे इसे नैतिक रूप से गलत मानते थे। उन्होंने कमरा बंद करके पिंजरे को जमीन पर रखा, दरवाजा खोला और अनाज बिखेरकर श्मट्ठू को बाहर आने के लिए प्रेरित किया। उनका उद्देश्य था कि श्मट्ठू को कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आने का मौका मिले और वे अपने ‘पाप’ का थोड़ा प्रायश्चित कर सकें। यह घटना जगन मास्टर की करुणा और नैतिकता को दर्शाती है।
श्मट्ठू के उड़ जाने की घटना ‘स्वतंत्रता की चाह’ और बंधन से मुक्ति के विचार को प्रस्तुत करती है। शुरुआत में श्मट्ठू पिंजरे का इतना आदी हो चुका था कि बाहर आने की इच्छा नहीं दिखाता, लेकिन लगातार खुले वातावरण का अनुभव मिलने पर उसकी नजर रोशनदान पर पड़ती है और वह बाहर की दुनिया की ओर उड़ जाता है। यह दिखाता है कि जीव-जंतुओं में भी स्वाभाविक स्वतंत्रता-प्रवृत्ति होती है। साथ ही, यह घटना ताई के जीवन में संवाद टूटने की भूमिका बनती है, जिससे अकेलेपन की त्रासदी और तीखी हो जाती है।
ताई का बड़ा घर ‘सूना खंडहर’ इसलिए कहा गया है क्योंकि वहाँ पहले जीवन की रौनक थी, पर अब परिवार के बिखरने से वह खाली और नीरव हो गया है। बहू-बेटे शहर चले गए, बेटियाँ अपने घरों में चली गईं, खेती-बाड़ी और कारबार भी समाप्त हो गए, और नौकर-चाकर टिक नहीं पाए। भौतिक रूप से घर बड़ा है, पर भावनात्मक रूप से उसमें सन्नाटा है। ताई के लिए यही सन्नाटा सबसे बड़ा दुख बन जाता है—“सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।” इसलिए यह घर उनके अकेलेपन का प्रतीक है।
श्मट्ठू के आने के बाद ताई अधिक सक्रिय, नियमबद्ध और जागरूक हो जाती हैं। जो ताई पहले अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं और व्रत-उपवास के बहाने खाना टाल देती थीं, वही अब श्मट्ठू के लिए नियमित दाल-भात बनातीं और उसके लिए रोटी बचाकर रखतीं। वे यह भी जानने लगती हैं कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हैं और किस पेड़ पर आखिरी अमरूद बचे हैं—यानी श्मट्ठू की जरूरतों के कारण उनका रोज़मर्रा का ध्यान बाहरी दुनिया की ओर बढ़ता है। यह परिवर्तन संवाद और जिम्मेदारी के असर को दिखाता है।
अड़ोस-पड़ोस की बहू-बेटियाँ ताई के घर इसलिए आने लगीं क्योंकि श्मट्ठू की बातचीत से घर में रौनक लौट आई थी और वे बच्चों का मन बहलाने के लिए श्मट्ठू के पास आती थीं। कहानी में बताया गया है कि बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे श्मट्ठू की बातचीत से ‘रौनक’ में बदल गया। जब सुबह पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं, श्मट्ठू भी पाठ शुरू कर देता और घर गुलजार हो जाता। इस तरह श्मट्ठू सामाजिक मिलन का केंद्र बन जाता है, जिससे ताई का अलगाव कुछ कम होता है।
ताई कुम्भ-स्नान के लिए इसलिए जाना चाहती थीं क्योंकि उनके मन में धर्म-संकट और परलोक की चिंता घर करने लगी थी। उन्होंने जीवन में ऊँच-नीच बहुत देख लिया था, और अब कभी-कभी धार्मिक आस्था तथा तीर्थ-स्नान का लोभ उन्हें आकर्षित करता है। गाँव के कई लोग प्रयागराज कुम्भ-स्नान के लिए जा रहे थे और अच्छा साथ बन रहा था। पर ताई के मन में एक साथ दो खिंचाव थे—प्रयाग का लोभ और श्मट्ठू की चिंता। अंततः जगन मास्टर की पत्नी के भरोसे पर वे यात्रा के लिए तैयार होती हैं, लेकिन यही यात्रा कहानी में मोड़ ले आती है।
ताई श्मट्ठू से अलग होने पर इसलिए व्याकुल होती थीं क्योंकि श्मट्ठू ही उनका सबसे बड़ा भावनात्मक सहारा और संवाद का साथी था। कहानी में स्पष्ट है कि ताई घड़ी-भर के लिए भी श्मट्ठू का वियोग सहन नहीं कर पाती थीं। कभी थोड़ी देर के लिए न्यौते में जातीं तो बार-बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें जाँचतीं, श्मट्ठू को ‘कंजूस के धन’ की तरह छिपाकर रखतीं, और जल्दी लौट आने का भरोसा देकर घर से निकलतीं। यह उनके अकेलेपन की तीव्रता और श्मट्ठू के प्रति अत्यधिक लगाव को दिखाता है।
‘महाकुम्भ’ का अर्थ यहाँ व्यंग्यात्मक और घटनात्मक है। ताई के कुम्भ-स्नान पर जाने के बाद जगन मास्टर के घर में श्मट्ठू को लेकर बड़ा हंगामा और असंतुलन पैदा हो जाता है। मास्टराइन ने पति से बिना सलाह लिए श्मट्ठू को रखने की जिम्मेदारी ले ली थी, जबकि जगन मास्टर पिंजरे में बंद पक्षी को देखकर बेचैन होते हैं। वे उसे रोज़ थोड़ी देर आज़ादी देने लगते हैं, और इसी प्रक्रिया में श्मट्ठू रोशनदान से उड़ जाता है। उसके बाद घबराहट, खोज, चिंता और ताई के लौटने का दबाव—सब मिलकर घर में ‘महाकुम्भ’ जैसा उलट-पुलट माहौल बनाते हैं।
श्मट्ठू की पिंजरे की आदत कहानी में ‘बंधनों की आदत’ और धीरे-धीरे पैदा होने वाली निर्भरता का संकेत देती है। जब जगन मास्टर पहली बार पिंजरे का दरवाजा खोलते हैं, तो श्मट्ठू बाहर आने की इच्छा नहीं दिखाता—वह पिंजरे में रहने का आदी हो चुका था। लेकिन जगन मास्टर अनाज बिखेरकर उसे धीरे-धीरे बाहर लाते हैं। कुछ दिनों तक रोज़ की आज़ादी मिलने पर श्मट्ठू में बाहर की दुनिया देखने की चाह जगती है और वह रोशनदान से उड़ जाता है। यह बताता है कि आदतें जीव को बाँधती हैं, पर अवसर मिलने पर स्वतंत्रता की आकांक्षा जाग उठती है।
गाँव वालों ने दूसरा तोता इसलिए लाने का निर्णय लिया क्योंकि उन्हें डर था कि ताई लौटकर श्मट्ठू को न पाएँगी तो उन्हें गहरा सदमा लगेगा। सभी ताई के तेज स्वभाव और श्मट्ठू के प्रति उनके अत्यधिक लगाव को जानते थे। श्मट्ठू के उड़ जाने की ‘अनहोनी’ ने गाँव में आशंका पैदा कर दी कि ताई की हालत बिगड़ सकती है। बहुत सोच-विचार के बाद गणपत ने सुझाव दिया कि श्मट्ठू जैसी सूरत-शक्ल का दूसरा तोता लाकर ताई को भ्रम में रखा जाए। यह निर्णय सहारा देने की मंशा से लिया गया, पर अंत में संवाद की कमी उजागर हो जाती है।
‘एवजी श्मट्ठू’ ताई को देखकर इसलिए नहीं बोलता क्योंकि वह असली श्मट्ठू नहीं है और ताई के साथ उसके पुराने संवाद-सम्बंध मौजूद नहीं हैं। ताई उम्मीद करती हैं कि उन्हें देखते ही श्मट्ठू “राम-राम सीताराम” की रट लगाकर पिंजरे में उछल-कूद करेगा, लेकिन स्थानापन्न तोता केवल इधर-उधर ताकता रहता है। यह स्थिति कहानी के शीर्षक ‘संवादहीन’ को और सार्थक करती है: बाहरी रूप समान होने पर भी आत्मीयता, यादें और संवाद का अनुभव नहीं बदला जा सकता। ताई पुकारकर थक जाती हैं, पर उनका संवाद लौटता नहीं।
कहानी का अंत ‘यथार्थवादी’ और काफी हद तक ‘मुक्त अंत’ जैसा माना जा सकता है। यथार्थवादी इसलिए कि जीवन में कई बार नुकसान की भरपाई केवल बाहरी विकल्पों से नहीं हो पाती; ताई के लिए असली श्मट्ठू का खो जाना संवाद के टूटने जैसा है। मुक्त अंत इसलिए कि कहानी स्पष्ट समाधान नहीं देती—असली श्मट्ठू लौटता नहीं, और ताई का अकेलापन फिर सामने आ जाता है। अंतिम पंक्तियों में संकेत है कि उनका साथी “न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा।” यह पाठक को ताई के भविष्य और सामाजिक स्थिति पर सोचने के लिए छोड़ देता है।
कहानी में परिवार का अभाव ताई के अतीत और वर्तमान के विरोध से स्पष्ट होता है। पहले बड़े घर में पुत्र-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर और अनेक गतिविधियाँ थीं। लेकिन समय के साथ बहू-बेटे गाँव छोड़कर शहरों के हो गए और बेटियाँ अपने-अपने गृहस्थ जीवन में रम गईं। खेती-बाड़ी और कारबार भी पराए हाथों में चला गया। परिणामस्वरूप ताई अकेली रह जाती हैं और घर का सन्नाटा उन्हें भीतर से तोड़ता है। यह अभाव केवल लोगों की कमी नहीं, बल्कि रिश्तों और संवाद के टूटने का अभाव भी है, जिसे श्मट्ठू थोड़े समय के लिए भरता है।
ताई और श्मट्ठू की नोक-झोंक कहानी में इसलिए जरूरी है क्योंकि यह उनके रिश्ते को जीवंत और वास्तविक बनाती है। यदि उनके बीच केवल आदर्श, मीठी बातें होतीं तो संबंध एकतरफा लगता। कहानी में दिखता है कि श्मट्ठू कभी अपनी जिद मनवाने के लिए पिंजरे में ‘तूफान’ खड़ा कर देता और पानी-दाने की कटोरियाँ उलट देता है। ताई खीझकर “मर जा!” कहती हैं, और श्मट्ठू वही दोहराता है। फिर मान-मनौवल होता है और प्रेम लौट आता है। यह दिखाता है कि सच्चे संबंधों में भावनाओं की पूरी विविधता होती है—स्नेह, झुंझलाहट और फिर अपनापन।
कहानी समकालीन जीवन की कई विसंगतियाँ दिखाती है—विशेषकर पलायन, अकेलापन और आदर्श-यथार्थ का द्वंद्व। पलायन के कारण ताई का परिवार गाँव छोड़कर शहरों में बस जाता है, जिससे वृद्धावस्था में ताई अकेली रह जाती हैं। अकेलापन इतना गहरा है कि घर की ‘भाँय-भाँय’ उन्हें काटने दौड़ती है और श्मट्ठू संवाद का विकल्प बनता है। आदर्श-यथार्थ का द्वंद्व जगन मास्टर के माध्यम से दिखता है: वे करुणा से श्मट्ठू को आज़ादी देते हैं, पर यथार्थ में वही आज़ादी उसे उड़ाकर ले जाती है, और ताई के जीवन में संवाद फिर टूट जाता है।
‘एकता और सहारा’ का विचार मुख्य रूप से ताई और श्मट्ठू के संबंध में दिखाई देता है। दोनों एक-दूसरे के लिए सहारा बन जाते हैं—“अब ये ही दो प्राणी… एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।” ताई श्मट्ठू की देखभाल करती हैं, उसे खिलाती हैं, उससे बातें करती हैं; वहीं श्मट्ठू ताई को जगाता है, उनके सवालों का जवाब देता है और उन्हें दिलासा देता है। इसके अलावा गाँव वाले भी किसी हद तक ताई के प्रति सामूहिक चिंता दिखाते हैं—ताई के लौटने से पहले श्मट्ठू उड़ जाने पर वे परेशान होते हैं और उसे जैसी शक्ल वाला दूसरा तोता लाने की योजना बनाते हैं। यह सामाजिक सहानुभूति का संकेत है।
शीर्षक ‘संवादहीन’ का सबसे सार्थक संदर्भ ताई का जीवन है, जहाँ परिवार से दूरी के कारण संवाद समाप्त हो गया है, और अंत में श्मट्ठू के उड़ जाने से बचा हुआ संवाद भी टूट जाता है। श्मट्ठू ताई के लिए संवाद का माध्यम था—उसकी ‘राम-राम, सीताराम’ जैसी रट और ताई की बातों का जवाब घर की रौनक बनते हैं। लेकिन कुम्भ-स्नान यात्रा के दौरान श्मट्ठू उड़ जाता है और उसकी जगह लाया गया तोता ताई को देखकर चुप रहता है। ताई उसे पुकारती हैं, पर परिचित संवाद नहीं मिलता। यही मौन और टूटे संवाद की पीड़ा ‘संवादहीन’ शीर्षक को गहराई देती है।
परीक्षा के लिए ‘संवादहीन’ से ये प्रमुख बिंदु याद रखें: (1) मुख्य पात्र—ताई और तोता श्मट्ठू; सहायक पात्र—गणपत, जगन मास्टर, मास्टराइन। (2) विषय—वृद्धावस्था का अकेलापन, परिवार का बिखराव, संवाद की जरूरत, मानव-पक्षी संबंध, पलायन। (3) घटनाक्रम—ताई का सूना घर; श्मट्ठू का आना और रौनक; कुम्भ-स्नान हेतु ताई का जाना; जगन मास्टर द्वारा आज़ादी देना; रोशनदान से श्मट्ठू का उड़ना; दूसरा तोता लाना; ताई का अंत में संवाद न पा सकना। (4) संदेश—सहारा जरूरी है, पर वास्तविक संवाद का विकल्प केवल दिखावे से नहीं बनता।