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आधार ग्रंथ

इस पाठ में सामवेद, रामायण, महाभारत, नाट्यशास्त्र और संगीत रतनाकर जैसे प्रमुख ग्रंथों की विशद जानकारी दी गई है, जो भारतीय संस्कृति के संगीत और नृत्य पर प्रभाव डालते हैं।

Summary, practice, and revision
CBSE
Class 11
Sangeet
Hindustani Sangeet Gayan Evam Vadan

आधार ग्रंथ

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More about chapter "आधार ग्रंथ"

इस पाठ में सामवेद का गान, रामायण और महाभारत के संगीत से संबंधित पहलुओं का अध्ययन किया गया है। सामवेद वेदों में अद्वितीय स्थान रखता है और इसे ईश्वर की आराधना का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। रामायण, जो कि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई, प्राचीन भारतीय संस्कृति का प्रमुख महाकाव्य है, जिसमें संगीत और नृत्य का गहरा संबंध है। महाभारत के भी संगीत से जुड़े अनगिनत पहलू हैं। इसके अतिरिक्त, नाट्यशास्त्र और संगीत रतनाकर जैसे ग्रंथों में संगीत और नृत्य की तकनीकें भी प्रस्तुत की गई हैं, जो भारतीय कला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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सामवेद, रामायण, महाभारत और अन्य संगीत ग्रंथ

सामवेद, रामायण, महाभारत, नाट्यशास्त्र और संगीत रतनाकर जैसे ग्रंथों का अध्ययन। जानें इन ग्रंथों का संगीत और नृत्य में महत्व।

सामवेद वेदों में से एक है, जो गान के लिए उपयुक्त ऋचाओं का संग्रह है। इसे ईश्वर की आराधना के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके पाठ के दौरान संगीत और वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है।
सामवेद मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित है: आकृतिक और गान। आकृतिक भाग ऋग्वेद की ऋचाओं का संग्रह है, जबकि गान भाग साम रागों का प्रदर्शन करता है।
रामायण प्राचीन भारतीय साहित्य का एक प्रमुख महाकाव्य है, जिसे महाकवि वाल्मीकि ने लिखा है। यह राम के जीवन, अद्वितीय व्यक्तित्व और उनके द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन करता है।
रामायण में संगीत का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके श्लोक संगीतबद्ध और गाने योग्य होते हैं, जो उस समय के सामाजिक जीवन में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाते हैं।
महाभारत एक अन्य प्रमुख महाकाव्य है, जो भारतीय संस्कृति और धर्म का गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह युद्ध और उसके परिणामों के माध्यम से जीवन के गहरे नैतिक और दार्शनिक सवालों को उजागर करता है।
नाट्यशास्त्र, जिसे भरत मुनि ने लिखा है, नृत्य, संगीत और नाटक के सिद्धांतों का संकलन है। इसमें नृत्य की तकनीकें, अभिनय की विधियाँ और संगीत का महत्व चर्चा में आता है।
संगीत रतनाकर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो सामवेद और अन्य भारतीय संगीत पद्धतियों पर आधारित है। इसमें संगीत की तकनीकी और वैधता से संबंधित जानकारी उपलब्ध है, जो संगीत की शिक्षा में सहायक है।
साम गान सामान्यतः पाँच हिस्सों में गाया जाता है। इनमें प्रसताव, उद्गीथ, प्रकतहार, उपद्रव और कनिन शामिल हैं। यह विभाजन साम गान के विभिन्न स्वरूपों को प्रकट करता है।
सामवेद ईश्वर की आराधना का एक अद्वितीय साधन है, जो विशेष रूप से संगीत के सरल और प्रभावशाली स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे धार्मिक अनुष्ठानों में इसकी विशेष भूमिका होती है।
रामायण में संगीत का उपयोग कथा के पात्रों, उनकी भावनाओं और अवसरों को खूबसूरती से व्यक्त करने के लिए किया गया है। इसके श्लोक छंदबद्ध हैं और गाने योग्य हैं।
महाभारत में संगीत के विविध स्वरूपों का वर्णन किया गया है, जो युद्ध के नैतिक विचारों को दर्शाता है। इसका संगीत संस्कृति और कला में गहरा प्रभाव डालता है।
नाट्यशास्त्र का लेखक भरत मुनि है, जो भारतीय नाट्य कला के स्रोत के रूप में माना जाता है। यह ग्रंथ नाटक, नृत्य और संगीत के सिद्धांतों का संग्रह है।
संगीत रतनाकर को पंकित शारथागदेव द्वारा लिखा गया है। यह ग्रंथ संगीत के साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसे 13वीं शताब्दी का बताया जाता है।
साम गान का मुख्य गायक 'उद्गाता' कहलाता है। वह साम गान के विशेष प्रकार को गाने का कार्य करता है।
साम गान का प्रारंभ 'हुम्' से होता है, जो सभी गायक एक साथ गाते हैं। यह साम गान का प्रारंभिक और महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उद्गीथ साम का प्रामाणिक गायन है, जिसे विशेष रूप से 'ओम' के उच्चारण के साथ प्रारंभ किया जाता है। इसे गाने वाले को 'उद्गाता' कहा जाता है।
कनिन का गायन साम गान के तीन विभिन्न गायकों द्वारा किया जाता है, जिनमें प्रसतोता, उद्गाता और प्रकतहताथा शामिल होते हैं।
रामायण में विभिन्न अवसरों और समारोहों के दौरान गाए जाने वाले गीतों का संदर्भ मिलता है, जैसे स्वागत, ध्यान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान।
महाभारत काल में संगीत एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तत्व था, जिसका प्रयोग युद्धों और समारोहों में किया जाता था। यह सामग्रियों के नैतिक मूल्यों को दृढ़ करता था।
नाट्यशास्त्र में कुल 36 अध्याय होते हैं, जिनमें से 28 से 33 अध्याय में संगीत से संबंधित कव्यों का वर्णन किया गया है।
सामवेद में संगीत का स्थान महत्वपूर्ण है, जो न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी है।

Chapters related to "आधार ग्रंथ"

भारतीय संगीत का सामान्‍य परिचय

इस अध्याय में भारतीय संगीत की मूल बातें समझाई गई हैं, जिसमें गायन, वादन और नृत्य का समावेश होता है। यह भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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हिदं स्‍ता ु नी संगीत के पारिभाषिक शब्‍द

यह अध्याय ध्वनि और संगीत के पारिभाषिक शब्दों के महत्व को समझाने पर केंद्रित है। यह संगीत के मूल तत्वों को परिभाषित करता है, जो संगीत के अध्ययन में सहायक होते हैं।

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हिदं स्‍ता ु नी संगीत की गायन एवं वादन विधाए

इस अध्याय में हिंदुस्तानी संगीत की गायन और वादन विधाओं पर चर्चा की गई है, जो भारतीय संगीत संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

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हिदं स्‍ता ु नी संगीत में राग प्ቍति का क्रमिक विकास

यह अध्याय भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग की क्रमिक विकास प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करता है। यह रागों की विशेषताओं और उनकी सांगीतिक विधाओं की महत्ता को समझाता है।

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राग परिचय एवं बंद‍िशें

इस अध्याय में भारतीय संगीत के महत्वपूर्ण रागों की जानकारी और उनके वादन की विशेषताएँ दी गई हैं। इससे छात्रों को रागों की संरचना और उनके भाव समझने में मदद मिलेगी।

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स्‍वर‑ताल लिपि प्ቍतियाँ

यह अध्याय भारतीय संगीत में स्वरलिपि और ताल लिपि की पद्धतियों का उपयोग और महत्व बताता है। यह संगीत विद्यार्थियों को गायन और वादन की विधियों को सीखने में मदद करता है।

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भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण

इस अध्याय में भारतीय संगीत में वाद्य यंत्रों के वर्गीकरण के बारे में चर्चा की गई है, जो संगीत की समृद्धि और विविधता को दर्शाता है।

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यह अध्याय विभिन्न तालों के ठेकों और लयकारी के बारे में जानकारी प्रदान करता है। यह संगीत में ताल की भूमिका और इसके महत्व को समझने में सहायक है।

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यह अध्याय भारतीय शास्त्रीय संगीत के घरानों की संस्कृति और महत्व को समझाता है। यह संगीत की पारंपरिक गान शैली और अनुशासन पर जोर देता है।

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आधार ग्रंथ Summary, Important Questions & Solutions | All Subjects

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