अतिथिदेवो भव
NCERT Class 6 Sanskrit Chapter 9: अतिथिदेवो भव (Pages 98–105)
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Summary of अतिथिदेवो भव
अतिथिदेवो भव at a Glance
CBSE
Class 6
Sanskrit
Deepakam
9
98–105
6 study resources
अतिथिदेवो भव Summary
इस अध्याय में 'अतिथिदेवो भव' का महत्व समझाया गया है। यह उपनिषद का सिद्धांत है जो दर्शाता है कि अतिथि को भगवान के समान मानना चाहिए। भारत में अतिथियों का स्वागत करने की एक पुरानी परंपरा है। जब कोई अतिथि आता है, तो उसे सम्मान और प्रेम से आदर देना चाहिए। यह विचार हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सामाजिक समरसता और एकता की भावना को बढ़ाता है। अध्याय में विभिन्न पात्रों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि परिवार के हर सदस्य को अतिथियों का स्वागत कैसे करना चाहिए। माता, पिता, पुत्र और पुत्री सभी मिलकर अतिथि का स्वागत करते हैं। वे एकत्रित होकर बहुत प्यार और स्नेह से उनकी सेवा करते हैं। इस प्रकार, अध्याय हमें सिखाता है कि घर में प्रेम और समझ की भावना होनी चाहिए। रात के समय जब अतिथि आते हैं, तो माहौल बहुत ही प्रेमपूर्ण और पवित्र होता है। प्रकाश और जोश से भरी रात में लोग एकत्रित होते हैं और पूजा का आयोजन करते हैं। यह सभी के लिए एक यादगार अनुभव होता है। कहानी में 'माजा भाई' जैसे पात्र भी हैं जो घटनाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। उनकी उपस्थिति और विचार दर्शाते हैं कि किस प्रकार से एक व्यक्ति दूसरों के साथ मिलकर जीवन का आनंद ले सकता है। अध्याय में यह भी बताया गया है कि रात्रि का समय सन्नाटे और शांति का होता है। यह हमें ध्यान लगाने और अपनी आत्मा की शुद्धि का समय प्रदान करता है। जब हम ‘अतिथिदेवो भव’ कहते हैं, तो हम एक महत्वपूर्ण प्रथा को अपनाते हैं जो मानवता के प्रति हमारे दृष्टिकोण को और भी व्यापक बनाती है। अतिथि ना केवल एक सामान्य व्यक्ति होते हैं, बल्कि उनके माध्यम से हमें सीखने का अवसर मिलता है। वे हमारे जीवन में आएंगे और अपने अनुभवों से हमें समृद्ध करेंगे। इसलिए, इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि हमें हमेशा अतिथियों का आदर करना चाहिए और उनके साथ सद्भावना से पेश आना चाहिए। यह कर्तव्य पूरी तरह से हमारे दातृत्व और उदारता को दर्शाता है। कुल मिलाकर, 'अतिथिदेवो भव' का संदेश हमें हमारे सामाजिक मूल्यों की अहमियत को याद दिलाता है और हमें एक अच्छे मेज़बान बनने की प्रेरणा देता है।
